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या देवी सर्वभूतेषु

हमारे धर्म में तमाम लोगों, यहां तक कि मानवेतर प्राणियों के लिए भी एक धर्मपरायण व्यक्ति और समाज के कर्तव्यों का निर्धारण है मगर विधवा के लिए कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिलता।

Author Published on: September 21, 2017 2:30 AM
प्रतीकात्मक चित्र

या देवी सर्वभूतेषु
गुरुवर रवींद्रनाथ के प्रसिद्ध उपन्यास ‘चोखेर बाली’ की नायिका विनोदिनी बेहद कम समय के अपने वैवाहिक जीवन के बाद भरी जवानी में विधवा हो जाती है। ऐसे में अपनी खराब सामाजिक स्थिति से खिन्न होकर व्यवस्था से सवाल करती है- ‘लोग ब्राह्मण को देते हैं, गाय को देते हैं। यहां तक कि कुत्तों और कौवों तक को देते हैं। मगर विधवा को कोई कुछ नहीं देता।’  इतने में ही सारी बातें स्पष्ट हो जाती हैं। हमारे धर्म में तमाम लोगों, यहां तक कि मानवेतर प्राणियों के लिए भी एक धर्मपरायण व्यक्ति और समाज के कर्तव्यों का निर्धारण है मगर विधवा के लिए कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिलता। पुरुष सत्ता की जकड़ का नतीजा यह है कि जीते-जी वह स्त्री का जीवन तो निर्धारित करती ही है, मरने के बाद तक उसके ऊपर शासन करती है। शृंगार नहीं करना, मांस-मछली नहीं खाना और शुभ अवसरों पर शामिल नहीं होना आदि अनेक बंधन हैं जो पुरुष के न रहने की स्थिति में भी स्त्री को गुलाम बनाए रखते हैं। देश में करोड़ों विधवाएं हैं जिनकी स्थिति बेहद खराब है। ऐसी बात केवल मथुरा-वृंदावन में नहीं है बल्कि हमारे-आपके घरों में भी है। यह बहुत बड़ी विडंबना है कि हमारे इसी देश में स्त्री को देवी, दुर्गा, चंडी आदि न जाने क्या-क्या कह कर पूज्य माना गया है, फिर विधवा हो गई स्त्री पर ऐसी खामोशी क्यों? हमारे देश में जितनी भी देवियां पूजी जाती हैं या तो वे सुहागन हैं या फिर कुंवारी। इन्हें चूड़ी-चुनरी और सिंदूर-शृंगार चढ़ा-चढ़ा कर सौभाग्य की प्रार्थना की जाती है। स्त्रियां कुछ ऐसी डरी होती हैं जैसे सुहागन न रहने की स्थिति में वे कुछ नहीं रह सकेंगी! हमारी यही सोच ‘सुहाग’ शब्द को आतंक का कारण बनाती है।

इन पूजा पद्धतियों से ऐसी सोच बैठाई जाती है कि सौभाग्यवती होना ही सब कुछ है, यह ‘होना’ जब खत्म हुआ तो समझो जीवन भी खत्म! यह धारणा तब और ज्यादा पुष्ट हो जाती है जब नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी अपने ही देश के जनकपुर मंदिर से पंडों द्वारा केवल इसलिए लौटा दी जाती हैं कि वे विधवा हैं। देवियों को पूज कर उनकी ही तरह होने की चाह रखने वाले हमारे समाज में कोई देवी विधवा नहीं है! हमारे यहां परित्यक्त देवी सती हैं, यहां तक कि दरिद्रता की देवी अलक्ष्मी तक पूजी जाती हैं मगर विधवा देवी हैं ही नहीं। हमारे धर्म को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए थी जिसमें एक विधवा भी पूज्य देवी हो सके। देवी पति के न रहने के बाद भी अलंकृत हों और पूरी गरिमा के साथ पूजी जाती रहें!  विधवा होना एक दुर्घटना है। यह दुर्घटना स्त्री को अपने पैरों पर खड़े होने और सही अर्थों में अपनी ताकत को आजमाने का मौका भी देती है। जिसे हम शक्ति कहते हैं वह पिता-पति पर आश्रित रह कर क्या शक्तिशाली रह जाती है! ऐसे में जब वैधव्य ही उसे शक्तिसंपन्न बनाता है तब उस स्थिति को गौरवान्वित क्यों न किया जाए! आज जरूरत है कि करोड़ों के इस समुदाय के हक में सरकार कुछ ठोस करे। हम अपनी सोच बदलें और देवी को सीता-सती-पार्वती की शर्तों से निकाल कर हर स्थिति में देवी समझें, विधवा होने पर भी उनके संपूर्ण अधिकारों, मसलन खाने-पहनने और हर जगह आने-जाने आदि की सुविधा सुनिश्चित करें। हमारे धर्मगुरु जो रात-दिन उपदेश देते हैं, हम जैसे स्वयंसेवक जो राम मंदिर और गाय की रक्षा के लिए चिंतित रहते हैं, अपने भीतर झांकें और विधवाओं के लिए समाज के बंद मगज को खोलने का उद्यम करें। यकीन मानिए, देवी-देवताओं के इस देश को जब हाशिये पर पड़ी करोड़ों और सशक्त देवियां मिलेंगी, इसकी महानता और भी ज्यादा बढ़ जाएगी।
’अंकित दूबे, जेनयू, नई दिल्ली
जमीनी समाधान
जापान के सहयोग से अगले पांच वर्षों में अमदाबाद और मुंबई के बीच बुलेट ट्रेन दौड़ने लगेगी। देश की उन्नति के लिए आधुनिक तकनीक अपनाना जरूरी है लेकिन पारंपरिक रेल व्यवस्था में जो कमियां-गड़बड़ियां हैं उनका जमीनी समाधान भी आवश्यक है। रेल दुर्घटनाओं में लगातार वृद्धि, सामान्य और द्वितीय श्रेणी के डिब्बों में यात्रियों की ठेलमठेल भीड़, मानव रहित रेलवे क्रॉसिंग, पेंट्री कार के भोजन की गिरती गुणवत्ता, कर्मचारियों की कमी आदि कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण बिंदु हैं जिन पर नए रेलमंत्री की नजर जानी चाहिए। इसके अभाव में माना जाएगा कि पहले से सुविधाभोगी वर्ग के लिए और अधिक सुविधाएं मिलें इसी कोशिश में सरकार अपनी सारी शक्ति और संसाधनों का उपयोग कर रही है।
’आरती सिन्हा, न्यू पुनाईचक, पटना

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