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सही फैसला

जबसे केंद्र में भाजपा की सरकार आई है तब से ‘देशभक्त’ कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो गए हैं। इन्हें अपने कर्त्तव्यों और देश के प्रति जिम्मेदारियों का भान भले न हो, दूसरों को नसीहत देने में महारत हासिल है।

Author October 25, 2017 2:00 AM
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- देशभक्ति जताने के लिए राष्ट्रगान गाने की ज़रूरत नहीं

दिल्ली की भलाई

आज बढ़ती जनसंख्या के कारण दिल्ली की हालत खराब है। एक अच्छे मास्टरप्लान के अभाव की वजह से समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। संजय गांधी और पूर्व शहरी विकास मंत्री जगमोहन ने कभी जनसंख्या नियंत्रण के साथ दिल्ली को पेरिस जैसा बनाने का सपना जरूर देखा था। मगर दुर्भाग्य से उनके सपने अधूरे ही रह गए। अब तो जनसंख्या नियंत्रण की बात ही बेमानी है। अब एक ही हल है कि एक अच्छा मास्टर प्लान तैयार किया जाए, जैसे चंडीगढ़ के लिए हुआ था। तभी दिल्ली का भला हो सकता है। दिल्ली को प्रदूषण और जाम से मुक्ति नहीं मिली तो वह तो दिन दूर नहीं, जब शहर के नाम यहां कहर ही बचा रह जाएगा।
’वेद मामूरपुर,नरेला, दिल्ली
पराली और किसान
हर बार की तरह इस साल भी सरकार ने खेतों में पराली जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसी के साथ जुर्माना करने के लिए सरकारी कर्मचारियों और सरपंचों को भी आदेश दिया है। जो भी किसान खेत में पराली जला कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएगा, उसकी सूचना तुरंत सरकार को देनी होगी। सालों से पराली जलाने का सिलसिला जारी है। अब इस समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है।
सरकारें पराली न जलाने का फरमान तो सुना देती हैं, लेकिन इसका समाधान कैसे हो, यह नहीं बतातीं। आखिर किसान बेचारा करे भी तो क्या करे। सरकारें किसानों को पराली को नष्ट करने वाले वाले यंत्रों पर सबसिडी देकर भी पराली को जलाने से रोक सकती हैं। साथ ही किसानों को जागरूक करने की भी जरूरत है। पराली से खेत में कंपोस्ट खाद तैयार की जा सकती है।
’जयदेव राठी, रोहतक, हरियाणा
सही फैसला
सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के समय खड़े होने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने बदल दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में कहा है कि राष्ट्रगान के वक्त खड़े होना जरूरी नहीं है। न्यायालय ने कहा कि किसी को देशभक्ति को दिखाने का फरमान नहीं दिया जा सकता। देखा जाए तो यह आदेश कुछ समय से देशभक्ति के नाम पर फैलाए जा रहे आडंबर का नकार है। जबसे केंद्र में भाजपा की सरकार आई है तब से ‘देशभक्त’ कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो गए हैं। इन्हें अपने कर्त्तव्यों और देश के प्रति जिम्मेदारियों का भान भले न हो, दूसरों को नसीहत देने में महारत हासिल है। कौन क्या खाएगा, कौन क्या पहनेगा, कौन कैसा मनोरंजन करेगा? यह अब यही लोग तय करना चाहते हैं, जैसे हिंदुस्तान कोई लोकतांत्रिक देश न होकर किसी की सामंती जागीर हो। ‘यह देश वसुधैव कुटुंबकम् को अपने में समेटे हुए है जिसका संपूर्ण विश्व में इसी विशेषता के कारण मान सम्मान है।’ सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी से इन तथाकथित देशभक्तों की आंखें खुल जानी चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह फैसला मील का पत्थर साबित होगा।
’सुशील कुमार शर्मा उत्तम नगर, दिल्ली

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