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चौपाल: पुलिस की हालत

आंकड़े बताते हैं कि देश के ‘वीआइपी’ व्यक्तियों के पीछे तीन पुलिसकर्मी मौजूद रहते हैं, जबकि छह सौ तिरसठ लोगों के लिए मात्र एक पुलिसकर्मी मौजूद हैं। समाज में अपराध का ग्राफ जिस तेजी से बढ़ रहा है, उस हिसाब से पुलिसवालों की संख्या बहुत ही कम है।

Author July 30, 2018 1:53 AM
संयुक्त राष्ट्र के निर्धारित मानदंड के अनुसार चार सौ चौवन लोगों पर एक पुलिसकर्मी होनी चाहिए।

देश की सवा सौ करोड़ लोगों को नियंत्रित करने वाले पुलिस तंत्र की स्थिति भयावह और चिंताजनक नजर आ रही है। ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट की रिपोर्ट के अनुसार देश में तकरीबन साढ़े छह सौ लोगों को नियंत्रण करने के लिए सिर्फ एक पुलिसकर्मी मौजूद हैं। संयुक्त राष्ट्र के निर्धारित मानदंड के अनुसार चार सौ चौवन लोगों पर एक पुलिसकर्मी होनी चाहिए। मगर हमारा देश इस आंकड़े के आसपास भी पहुंचता नजर नहीं आ रहा। अमेरिका में चार सौ छत्तीस लोगों पर एक पुलिसकर्मी मौजूद है। भारत में सिर्फ साढ़े उन्नीस लाख पुलिसकर्मी हैं। साढ़े पंद्रह हजार पुलिस थाने और चौकियां हैं। इनमें ज्यादातर पुलिस चौकियों में न तो कोई गाड़ी मौजूद है, न हीं कोई टेलीफोन।

आंकड़े बताते हैं कि देश के ‘वीआइपी’ व्यक्तियों के पीछे तीन पुलिसकर्मी मौजूद रहते हैं, जबकि छह सौ तिरसठ लोगों के लिए मात्र एक पुलिसकर्मी मौजूद हैं। समाज में अपराध का ग्राफ जिस तेजी से बढ़ रहा है, उस हिसाब से पुलिसवालों की संख्या बहुत ही कम है। दूसरी नौकरियों की तुलना में पुलिस विभाग पर काम का बोझ भी काफी होती है। साइबर क्राइम के अलावा आतंकवाद और नक्सलवाद से निपटना पुलिसवालों की समस्याओं को और बढ़ा देती है। पुलिसकमिर्यों के ऊपर अतिरिक्त काम का बोझ होने के कारण त्योहारों में अपने परिवारों से दूर रहने पर मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए पुलिस विभाग के खाली पदों को जल्द से जल्द भरे।
’पीयूष कुमार, नई दिल्ली

बारिश की मार
पिछले कुछ दिनों से हो रही बारिश से देश के कई शहरों में लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई शहरों में बारिश के पानी की निकासी के लिए स्थायी उपाय न होने से जगह-जगह जलभराव हो गया है, जो बेहद संकटपूर्ण स्थिति है। घरों में, बड़ी-बड़ी इमारतों के पास पानी जमा हो जाना गंभीर समस्या बन गई है। सड़कों के पानी में डूब जाने पिछले दिनों नोएडा और गाजियाबाद में इमारतें ढहने की घटनाएं सामने आई हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, इससे पहले भी बारिश के मौसम में ऐसे हादसे होते रहे हैं। इसके बावजूद इसका समाधान नहीं तलाशा जा रहा। शहरी ढांचे के निर्माण और रखरखाव करने वाले विभाग का बजट हर साल बढ़ता जा रहा है। बावजूद इसके ऐसी घटनाओं में कमी नहीं आ रही है। बिल्डर सरकारी महकमों की मिलीभगत से बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर रहे हैं और सारे नियम-कायदों को ताक पर रख रहे हैं। ऐसे लोगों पर नकेल कसने की जरूरत है।
’शुभम शर्मा, गोरखपुर

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