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चौपाल: शिक्षा के बजाय

बढ़ते प्रदूषण और शिक्षा के स्तर में गिरावट के बीच लगता है कि कोई गणितीय समीकरण है। आजादी के बाद धीरे-धीरे हमारे यहां प्रदूषण बढ़ा और लगभग उसी अनुपात में शिक्षा के स्वरूप में विकृतियां आने लगीं।

Author November 5, 2018 3:21 AM
प्रतीकात्मक फोटो (Source: IE photo by Gajendra Yadav)

शिक्षा के बजाय
बढ़ते प्रदूषण और शिक्षा के स्तर में गिरावट के बीच लगता है कि कोई गणितीय समीकरण है। आजादी के बाद धीरे-धीरे हमारे यहां प्रदूषण बढ़ा और लगभग उसी अनुपात में शिक्षा के स्वरूप में विकृतियां आने लगीं। हमें भौतिक और साहित्य का नोबेल पुरस्कार तब मिला जब हमारा शरीर भले ही गुलाम था, लेकिन मस्तिष्क आजाद था। शिक्षा सिर्फ स्कूलों की टूटी-फूटी दीवारों में ही नहीं मिलती, वह बालकों को एक सीख के रूप में अपने बड़ों से भी मिलती है। उन लोगों से मिलती है जो उनका इतिहास बनाते हैं। बच्चों के सामने हम कुछ आदर्श परोसते हैं और बच्चे उन महान लोगों का अनुसरण करते हैं। मैं जब किशोर था तो सोचता था कि नेहरूजी और नेताजी की तरह बनूंगा, लेकिन इधर पिछले सारे आदर्शों पर कीचड़ पोता जा रहा है। किशोर सोच नहीं पा रहा है कि वह किसके जैसा बने?

भाषा का ज्ञान और बातचीत के तौर-तरीके विद्यार्थियों को टेलीविजन पर आने वाले राजनीतिक दलों के प्रवक्ता सिखा रहे हैं। अध्यापक किसी और लोक से नहीं आते। वे भी यहीं तैयार होते हैं। भ्रष्ट नेताओं को मजबूरी में प्रणाम करने वाले शिक्षक बच्चों को भला उच्च आदर्शों से कैसे परिचित करा सकते हैं। दवा में दारू मिल चुकी है तो मरीज को नशा तो होगा ही। हम सब चले जा रहे हैं। किधर जा रहे हैं- यह सोचने का मौका कहां और किसे है? कई शिक्षा मंत्रियों का शिक्षा से पैदाइशी बैर रहा है तो वे जो नुकसान कर गए, उसकी भरपाई मुश्किल है। बतख पालिए और आॅक्सीजन की मात्रा बढ़ाइए या फिर नाले के किनारे चाय का खोखा लगाइए! विद्यार्थियों को पुष्पक विमान की खोज में व्यस्त रखिए और खुद आप नेताओं के बंगलों पर दरी बिछाइए। विद्यार्थियों को पहले प्रदूषण से बचाइए और फिर सोचिए कि उन्हें सरकारी स्कूल में भेजेंगे या कहीं और, जहां उन्हें ‘एक्सक्यूज मी’ की जगह ‘स्क्वीज मी’ बोलना सिखाया जाएगा, ताकि वे भविष्य में अपने समाज को ‘स्क्वीज’ (निचोड़) सकें।
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका

राष्ट्रवाद के सहारे
कुछ ही दिनों बाद अमेरिका में प्रतिनिधि सदन और सीनेट के लिए मध्यावधि चुनाव होने हैं। इस समय भले ही दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी को बहुमत प्राप्त है। मगर 6 नवंबर के बाद इसकी सूरत बदल भी सकती है। इसीलिए शायद राष्ट्रपति ट्रंप ने नया राष्ट्रवादी कार्ड खेला है। अब वे कह रहे हैं कि जन्म के साथ ही किसी को भी अमेरिकी नागरिकता नहीं दी जाएगी। इसके लिए कार्यकारी अध्यादेश लाएंगे। जबकि उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि इसके लिए संविधान संशोधन की जरूरत पड़ेगी। वरना इस आदेश को अदालत में चुनौती दे दी जाएगी। आप्रवासियों के देश के रूप में जिसकी पहचान थी, आज वह राजनीतिक कारणों से ‘श्वेत राष्ट्रवाद’ का प्रचार कर रहा है। इधर राष्ट्रपति जन्म से नागरिकता छीने जाने का बात कर रहे हैं, उधर दसियों हजार शरणार्थी होंडुरास, गुएतमाला और अलसल्वाडोर से अमेरिका के तरफ आ रहे हैं। अब देखना है कि अमेरिका इनसे कैसे निपटेगा! कहीं दोनों सदनों में इनका बहुमत चला जाए, तब अपनी राष्ट्रवादी नीतियों को वे कैसे अमेरीकियों के ऊपर थोपेंगे?
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

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