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चौपाल: सावधानी बेहतर

राजनीति में सेना के दखल के कारण ही आज तक पाकिस्तान विकास की राह से भटका हुआ है। दूसरी ओर चीन की छाया भी पाकिस्तान की काया बदलने देने को तैयार नहीं है, क्योंकि ऐसा होने से चीन की सामरिक और आर्थिक नीतियों को जोर का झटका लगेगा।

इमरान खान

पाकिस्तान में तहरीक-ए-इंसाफ का एक बड़े दल के रूप में उभरना भारत के लिए चिंता और चुनौती का विषय है। इससे सारा जगत परिचित है कि सेना की मर्जी के बिना पाकिस्तान में पत्ता भी नहीं डोलता। यह मुद्दा राजनीति से जुड़ा है। वर्षों तक पाकिस्तानी सत्ता पर काबिज रहे नवाज शरीफ की आतंकियों को पनाह देने को अपना देशप्रेम मानने वाली सेना से बेरुखी का नतीजा ही चुनावी जंग में उनकी हार और इमरान खान की जीत का एक बड़ा कारण माना जा रहा है। यों भी पाकिस्तान में जितनी सरकारें बनीं, वे एक ही थाली में खाकर पली हैं। इससे यही साफ होता है कि पाकिस्तान में कोई भी सरकार आए या जाए, चाहे वह भारत को कितना भी एक के बदले दो कदम आगे बढ़ने की बातों से फुसलाए, लेकिन भारत को हर समय सावधानी बरतनी होगी। इतिहास इसका गवाह है कि पाकिस्तान में जब भी नई सरकार के गठन के बाद भारत ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया, तब उसे थोड़े ही दिनों बाद निराशा का सामना करना पड़ा।

राजनीति में सेना के दखल के कारण ही आज तक पाकिस्तान विकास की राह से भटका हुआ है। दूसरी ओर चीन की छाया भी पाकिस्तान की काया बदलने देने को तैयार नहीं है, क्योंकि ऐसा होने से चीन की सामरिक और आर्थिक नीतियों को जोर का झटका लगेगा। यही कारण है जो विकास के नाम पर चीन द्वारा पाकिस्तान को दिया गया कर्ज सेना और आतंकियों पर ही खर्च हो जाता है। पहली बार सत्ता का सुख भोगने के कारण इमरान खान सेना के खिलाफ जाने से कतराएंगे। अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो पूर्व सरकारों की तरह कुर्सी पर कायम रहने को तरस जाएंगे। ऐसे में दोनों तरफ से घिरे इमरान खान से पाकिस्तान के विकास और दोस्ती की आस करने से पहले थोड़ा इंतजार करने की जरूरत है।
’पिंटू सक्सेना, दिल्ली

शिक्षा के बजाय
शिक्षा का अधिकार संशोधन विधेयक को लोकसभा ने पास कर दिया है। इसके तहत अब पांचवीं और आठवीं में सभी बच्चों को दो बार में उत्तीर्ण होना होगा। नहीं तो उन्हें उसी कक्षा में फिर से पढ़ाई करनी होगी। सरकार का दावा है इससे दसवीं और बारहवीं के परिणामों में सुधार होगा। मुझे नहीं लगता है कि ऐसा होगा। सुधार के स्थान पर फेल हुए विद्यार्थी, खासतौर पर लड़कियां स्कूल जाना ही बंद कर देंगी। शिक्षा के स्तर में गिरावट और विद्यार्थियों का उत्कृष्ट प्रदर्शन न कर पाने के पीछे 2009 का कानून नहीं है, जिसमें आठवीं तक सभी बच्चों को पास कर देने की नीति बनाई गई थी।

असल मुद्दा है शिक्षा के क्षेत्र में आधारभूत संरचना एवं संसाधन का अभाव। आज भी स्कूलों में नौ लाख शिक्षकों का पद खाली है। पांच लाख अप्रशिक्षित लोगों को ठेके में लगा कार काम कराया जा रहा है। स्कूल का भवन नहीं है। बैठने के लिए बेंच और डेस्क नहीं है, किताबें नहीं हैं। केंद्र और राज्य सरकारें अपने बजट का तीन प्रतिशत भी शिक्षा में खर्च नहीं करतीं। जब समान काम के लिए सामान वेतन ठेके पर रखे गए शिक्षक मांगते हैं तो उन्हें देने से मना कर दिया जाता है, क्योंकि सरकार के पास पैसे नहीं हैं। सरकार इन सब समस्याओं को दूर करने का इंतजाम करे। मुझे नहीं लगता हमारे देश के बच्चों में काबिलियत की कमी है।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी

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