jansatta Choupal opinion artical about A couple Sanjay and Sheetal marry in Uttar Pradesh between more than 350 police personnel - चौपाल: मैली सोच - Jansatta
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चौपाल: मैली सोच

देश को आजाद हुए इकहत्तर साल पूरे होने को हैं और संविधान ने हर नागरिक को समान अधिकार दिए हैं लेकिन अधिकतर लोगों की सोच आज भी वही पुरानी भेदभाव वाली है। भारत की प्रगति में जाति भेद सबसे बड़ा बाधक है।

Author July 20, 2018 1:54 AM
उत्तर प्रदेश कासगंज के गांव निजामपुर में एक युगल संजय और शीतल की शादी।Express Photo by Gajendra Yadav)

उत्तर प्रदेश कासगंज के गांव निजामपुर में एक युगल संजय और शीतल की शादी 350 से ज्यादा पुलिस कर्मियों की कड़ी सुरक्षा के बीच हुई। संजय कोई प्रदेश या केंद्र की कैबिनेट का मंत्री नहीं है। पुलिस वाले वहां इसलिए थे कि संजय अनुसूचित जाति से है और निजामपुर के दबंग नहीं चाहते थे कि वह घोड़ी पर बैठ कर बारात लेकर कर गांव में आए। हैरत की बात तो यह है गांव के दलितों में कोई दूल्हा घोड़ी पर चढ़ कर नहीं आ सका है। एक लंबे संघर्ष के बाद संजय घोड़ा बग्गी पर बैठ कर बारात लेकर आया जिसमें प्रदेश सरकार और पुलिस प्रशासन ने पूरा सहयोग किया और मीडिया ने भी सकारात्मक भूमिका निभाई। मुद्दा केवल संजय और शीतल की शादी का नहीं है, भारत के अनेक इलाकों में इस तरह की घटनाएं देखने को मिलती रही हैं। संजय और शीतल तो दृढ़ निश्चय वाले थे जो हिम्मत नहीं हारे। लेकिन हर कोई इतना हिम्मत वाला नहीं होता है।

देश को आजाद हुए इकहत्तर साल पूरे होने को हैं और संविधान ने हर नागरिक को समान अधिकार दिए हैं लेकिन अधिकतर लोगों की सोच आज भी वही पुरानी भेदभाव वाली है। भारत की प्रगति में जाति भेद सबसे बड़ा बाधक है। आज हमारा देश विश्व की सबसे बड़ी शक्ति बनने को प्रयत्नशील है पर मन में जाति भेद और ऊंच-नीच का मैल भरा पड़ा है। अगर हम इस भेदभाव को मिटा दें तो भारत को विश्व गुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता है।
’सुनील कुमार सिंह, मेरठ

पुनर्विचार की जरूरत
कुछ दिन पूर्व हरियाणा सरकार ने घोषणा की कि प्रदेश में दुष्कर्म और छेड़छाड़ के आरोपियों की तमाम सरकारी सुविधाएं चार्जशीट दाखिल होते ही तब तक के लिए बंद कर दी जाएंगी जब तक वह न्यायालय से बाइज्जत बरी न हो जाए। यह कदम सतही तौर पर स्वागतयोग्य प्रतीत होता है पर गंभीरता पूर्वक विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए भावुकता से लिया गया निर्णय है। ऐसे भावुकता पूर्ण अतार्किक निर्णय का कोई तभी तक स्वागत कर सकता है जब तक वह स्वयं इसका शिकार न बने। दरअसल, इस निर्णय से हमारी न्यायप्रणाली की मूल भावना का उल्लंघन होता दिखाई दे रहा है। न्याय का यह अघोषित सिद्धांत है कि जब तक अपराध सिद्ध नहीं हो जाता, व्यक्ति निर्दोष माना जाता है। सजा देना तो दूर की बात है, विचाराधीन आरोपियों को अपराधी कहना भी सही नहीं माना जाता। लेकिन यह निर्णय तो आरोप लगते ही व्यक्ति अपराधी मान कर सजा देता दिखाई दे रहा है!

सर्वविदित है कि हमारे देश में दुर्भावनावश किसी को बदनाम व परेशान करने के लिए आरोप लगाने के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। छेड़छाड़ से लेकर सामूहिक दुष्कर्म तक के कई मामले जांच अथवा न्यायालयी सुनवाई के दौरान सरासर फर्जी पाए गए हैं। लिहाजा, सरकार को अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए।
’ऋषभ देव पांडेय, जशपुर, छत्तीसगढ़

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