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चौपालः अब येस बैंक

आप घर में नगदी रख नहीं सकते। बैंक में पैसा सुरक्षित रहने की गारंटी नहीं है। सरकारी संस्थाओं का ऐसे समय में बेतहाशा निजीकरण किया जा रहा है, बड़े घराने डूब रहे हैं। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति है।

चौपालः शिक्षा की चुनौतियां।

अब येस बैंक के डूबने की खबर से संपूर्ण भारत में कमोबेश वही भयावह स्थिति बन गयी है जो छह महीने पूर्व पीएमसी बैंक के डूब जाने से कुछ राज्यों में देखने को मिली थी। जब पीएमसी बैंक डूबा था, तो बड़ी संख्या में लोग गंबीर संकट में फंस गए थे और पैसा नहीं मिलने के सदमे में कुछ लोगों की मौत भी हो गई थी। मरने वालों में एक बुजुर्ग भी थे जिनके इस बैंक में ग्यारह लाख रुपए जमा थे, लेकिन वे अपने इलाज के लिए पैसा नहीं निकाल पाए और अवसाद में दम तोड़ दिया। ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब जरूरत पड़ने पर आदमी अपना पैसा निकाल नहीं पाए तो उसके होने का फायदा क्या है?

अब देश के चौथे सबसे बड़े निजी बैंक यानी येस बैंक की हालत सबके सामने है। देशभर में इसकी ग्यारह सौ से ज्यादा शाखाएं हैं। येस बैंक ने जिन कंपनियों को कर्ज दे रखा है, उनमें से अधिकतर कंपनियां दिवालिया होने की कगार पर हैं, लिहाजा लोन वापस मिलने की गुंजाइश कम है। हालांकि सरकार ने हाल में यह नहीं कहा कि हम बैंक नहीं डूबने देंगे, बल्कि यह कहा कि बैंक डूबेगा तो पांच लाख रुपए तक लौटा देंगे। मतलब सरकार सिर्फ पांच लाख रुपए की जिम्मेदारी लेगी। इस घटना से तो बैंकों पर से लोगों का भरोसा उठ गया है। आप घर में नगदी रख नहीं सकते। बैंक में पैसा सुरक्षित रहने की गारंटी नहीं है। सरकारी संस्थाओं का ऐसे समय में बेतहाशा निजीकरण किया जा रहा है, बड़े घराने डूब रहे हैं। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति है।
’रूपेश गुप्ता, गाजियाबाद

गेहूं के साथमध्य प्रदेश में इन दिनों राजनीतिक उठापटक की परिस्थिति की चर्चा जोरों पर है। सत्ता पक्ष के कुछ विधायकों के नाखुशी की बात की जा रही है तो वहीं विपक्ष के कुछ लोग भी अपनी पार्टी से नाराज बताए जा रहे हैं। गुरुग्राम और बंगलुरु जैसे स्थानों पर विधायकों को रिझाने में रणनीतिकार भिड़े हैं। हालांकि सरकार सुरक्षित होने का दावा कर रही है। जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को गिराने के षड्यंत्र एक तरह से जनादेश का अनादर है, लेकिन राजनीतिक तौर पर इसे परिहार्य माना जाता है। कर्नाटक की घटना इसका अच्छा उदाहरण है। मध्य प्रदेश में कुछ दिन पहले ही सदस्यों की नैतिकता का प्रशिक्षण कराने की बातें हुर्इं। उत्तर प्रदेश में भारतीय प्रबंध संस्थान, लखनऊ में मंत्रियों की पाठशाला कुछ महीने पहले लग चुकी है। लेकिन शायद ये सवाल उनकी नैतिकता के मूल्यों के अनुकूल मालूम पड़ता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में ऐसी ही कुछ नीतियों का जिक्र है। बहरहाल, सत्ता तो सदस्यों की बहुमत पर निर्भर करती है, जिसे हासिल करने में नेतागण माहिर होते हैं। लिहाजा चिंता की बात जनता के नुकसान का है जो नई सरकार आने के बाद प्रशासनिक सर्जरी के कारण महीनों जनकल्याणकारी कार्यों में व्यवधान के तौर पर होता है। जनता की स्थिति गेहूं के साथ घुन के पिसने जैसी हो जाती है।
’कृष्ण चंद्र त्रिपाठी, उज्जैन, मध्यप्रदेश

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