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चौपाल : न्याय की राह

इस जघन्य मुकदमे की परिणति सात वर्ष तीन माह बाद होने से स्थापित मान्यता पुन: दुहराया गया कि न्याय-मंदिर में देर भले हो, लेकिन अंधेर नहीं। समय का तकाजा है कि मुकदमे में व्याप्त जटिलताएं, जिसने लघु दूरी तय करने में अथक समय नष्ट कर अंतिम न्यायिक निर्णय की डोर को मुट्ठी में बांधे रखा, को समाप्त करने की दिशा में नितांत कार्रवाई की आवश्यकता है।

न्यायपालिका में देर से ही सही लेकिन आया न्यायिक फैसला और देश की बेटी को मिला इंसाफ।

न्यायिक अपराध शास्त्र में दर्ज इस जघन्य मुकदमे की परिणति सात वर्ष तीन माह बाद होने से स्थापित मान्यता पुन: दुहराया गया कि न्याय-मंदिर में देर भले हो, लेकिन अंधेर नहीं। इस अभूतपूर्व मुकदमे के आरंभ से अंत तक निष्पक्ष अध्ययन के बाद एक बुनियादी सवाल अहम है कि सत्रह माह में पुलिस द्वारा प्रारंभिक न्यायालय में आरोपियों के विरुद्ध चार्जशीट दायर करने के बाद भी अंतिम फैसले में करीब छह वर्ष से अधिक समय क्यों लगे? सही है कि बचाव पक्ष ने भारतीय दंड संहिता और सीआरपीसी में अंकित धाराओं के आधार पर ही अपनी वाक्य-चातुर्य दलीलों और दांवपेच का उपयोग कर इसे अधिकाधिक विलंबित किया और हमारे कानूनी प्रावधानों को एक धूमिल आईना भी दिखाया। चूंकि न्यायिक प्रक्रिया का अंतिम उद्देश्य यही है कि बचाव पक्ष को नियमों की जटिल शर्तों के बावजूद उसे हर बात कहने और सुनाने का अवसर दिया जाए, जिसका भरपूर दुरुपयोग इस वाद में किए जाने का साक्ष्य दर्ज हो गया है।

समय का तकाजा है कि मुकदमे में व्याप्त जटिलताएं, जिसने लघु दूरी तय करने में अथक समय नष्ट कर अंतिम न्यायिक निर्णय की डोर को मुट्ठी में बांधे रखा, को समाप्त करने की दिशा में नितांत कार्रवाई की आवश्यकता है। हालांकि यह भी सही है कि हर आपराधिक कृत्यों के दंड तय हैं, फिर भी नित्य घटनाओं की संख्या कम होने के बजाय वृद्धि की ओर अग्रसर है। निर्भया कांड के बाद भी देश के हर कोने में बलात्कार की घटना होती रही, क्योंकि अपराधी समूह का विकृत मस्तिष्क भय से अभय के पथ पर चलने की और प्रवृत्त रहा। हमारे लोकतंत्र के लचीलेपन और कानूनी करिश्मे ने ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ को मात्र लुभावने नारों तक ही सीमित रखा है। निर्भया के मामले में हुए निर्णय से सत्य का सूर्योदय हुआ तो दिखता है, लेकिन नित्य सूर्यास्त के पूर्व और गहन अंधेरा छाते ही कितनी भारतीय बेटियां बलात्कारियों के अपराध का शिकार हो जाती हैं।

इस पर हमारी नियति तय करने वालों को प्रभावी निर्णय करना होगा। हम भारतवासी जो पूरे विश्व में सबसे अधिक भावुकता की श्रेणी में प्रसिद्ध होकर ऐसी निर्मम घटनाओं के विरुद्ध कुछ दिनों तक काली पट्टी बांध कर जुलूस निकालते हैं और फिर स्थितप्रज्ञ हो जाया करते हैं, को नूतन नैतिक दायित्व और न्यायिक परिवेश में सामाजिक चेतना जागरण के लिए संशोधित आंदोलन अध्याय तलाशने होंगे, ताकि गुनहगारों द्वारा असंख्य निर्भया समान बेटियों के खिलाफ हो रहे अपराधों को रोका जा सके। भारत गांवों का देश है, जहां ऐसी अनगिनत घटनाएं सामाजिक रूढ़िवादिता के चलते दब कर रह जाती हैं। ऐसी खबरों को संवाद पटल पर लाकर न्याय के तराजू पर रखने की भी जरूरत है।
’अशोक कुमार, पटना

प्रबंधन का पानी
एक बार फिर कल विश्व जल दिवस यानी 22 मार्च के दिन जल की अहमियत को आंका जाएगा। मनुष्य बखूबी जानता है कि जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। मनुष्य ने अपनी भौतिक विलासी जीवन पद्धति में प्राकृतिक संसाधनों का बड़े स्तर पर दोहन किया है। उसने अपनी जीवन शैली में अभूतपूर्व बदलाव किया है, जिसमें अपनी बढ़ती आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रकृति के साम्राज्य का भयानक विनाश किया। इसका ही परिणाम है कि पृथ्वी के लगभग तीन-चौथाई भाग पर जल होने के बावजूद संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि विश्व की आधी आबादी को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं है। भारत में तो स्थिति और भी भयावह है, कहीं बाढ़ कहीं सूखा। यह हमारे अकुशल जल प्रबंधन की ओर संकेत करता है। कहा तो यहां तक गया है कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। हो सकता है कि ऐसा नहीं भी हो, लेकिन पीने के शुद्ध जल की कमी तो जगजाहिर है। पानी के जो स्रोत हमारे पास हैं, वे आबादी के बढ़ते बोझ से सिकुड़ते जा रहे हैं।

आजकल पीने के पानी की शुद्धता पर प्रश्न चिह्न लगा हुआ है। बरसात का पानी जमीन पर गिरने से पहले सामान्यत: अशुद्धियों से मुक्त होता है। जैसे ही यह जल मृदा के संपर्क में आता है तो यह मृदा में घुलनशील और अघुलनशील अशुद्धियों के मिलने पर अशुद्ध हो जाता है। जहां कहीं फैक्टरियों और उद्योगों के कारण हवा में सल्फर और नाइट्रोजन के आॅक्साइड की अधिकता रहती है, वहां वर्षा की बूंदों में अम्लों के अंश जुड़ जाते हैं, जो अम्ल वर्षा का कारण बन जाता हैं। यही अशुद्ध जल हैजा, टायफायड, पीलिया और हैपेटाइटिस जैसे विभिन्न प्रकार की बीमारियों को न्योता देता है।
पानी की कमी हमारे लिए चिंता का विषय है। इस समस्या को गंभीर होने से रोका जाना जरूरी है। बेहतर जल संरक्षण और जल प्रबंधन ही हमें भविष्य में इस चिंता से मुक्त कर पाएगा। मनुष्य इतिहास में झांकने से पता चलेगा कि विश्व की महान सभ्यताएं बड़ी नदियों के किनारे ही उत्पन्न और विकसित हुई हैं। मानव द्वारा इनके अविवेकपूर्ण उपयोग और दुरुपयोग ने इन सभ्यताओं को कब्रगाहों में बदल दिया है। इसलिए हमें समय रहते जल की अहमियत को समझा चाहिए।
’अली खान, जैसलमेर, राजस्थान

मुश्किल वक्त में
बीते कुछ वक्त से कोरोना वायरस की दहशत से लोग डरे हुए है। इसके कहर के चलते स्कूल, कॉलेज, दफ्तर लगभग बंद हैं। लोग घरों से काम कर रहे हैं और अनावश्यक बाहर नहीं निकल रहे। हर रोज कोरोना के कई नए मामले सामने आ रहे हैं, वहीं बहुत से लोग ठीक भी हो रहे हैं। एहतियात के तौर पर लोग खासी सावधानी बरत रहे हैं, पर इसके साथ ही अफवाहें फैलना भी शुरू हो रहा है। हाल ही में यह अफवाह फैली कि बाजार में राशन, सब्जियां और रोजमर्रा की चीजों की आपूर्ति नहीं होगी तो लोग अपने घरों में राशन भर कर रख लें। इस अफवाह के बाद बाजार में एकदम से भीड़ बढ़ गई और लोग जरूरत का राशन खरीदने लगे। चूंकि यह बहुत संवेदनशील है तो लोग इस बात पर भरोसा करते भी दिखे। बाजार में भी कई चीजों की कीमतों में अचानक से वृद्धि हो गई। इस वक्त जरूरी है कि लोग अफवाहों पर ध्यान न दें और संभव हो तो इन्हें फैलने से रोकें। प्रधानमंत्री ने भी देश को संबोधित करते हुए कहा कि दूध-सब्जियों और अन्य खाद्यान्न की आपूर्ति पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन व्यवहार में हकीकत कुछ और है और सभी जरूरी चीजों की कीमतें बेलगाम होती जा रही हैं। सरकार को इन सब पर भी निगाह रखने की जरूरत है।
’उपासना, दिल्ली विवि, दिल्ली

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