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दबाव में बच्चे

देश में बढ़ती मंहगाई, बेरोजगारी और प्रतिस्पर्धा को देख कर हर माता-पिता अपने बच्चों को इन सभी समस्याओं से दूर रखने और उनके बेहतर भविष्य के लिए उन्हें अच्छी शिक्षा के लिए प्रेरित करते हैं, ताकि बच्चे अच्छे डॉक्टर, इंजीनियर, वकील आदि जैसे पेशों में शोहरत कमा सकें और समाज में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति बन सकें।

Author Published on: March 11, 2019 4:33 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो)

देश में बढ़ती मंहगाई, बेरोजगारी और प्रतिस्पर्धा को देख कर हर माता-पिता अपने बच्चों को इन सभी समस्याओं से दूर रखने और उनके बेहतर भविष्य के लिए उन्हें अच्छी शिक्षा के लिए प्रेरित करते हैं, ताकि बच्चे अच्छे डॉक्टर, इंजीनियर, वकील आदि जैसे पेशों में शोहरत कमा सकें और समाज में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति बन सकें। लेकिन वैश्वीकरण के कारण आज पढ़ाई के अतिरिक्त खेल, संगीत, नृत्य जैसे कई अन्य क्षेत्र है जिसमे बच्चे अपना भविष्य बनाना चाहते हैं। लेकिन पढ़ाई को लेकर माता-पिता की बच्चों पर जो अपनी इच्छाएं थोप रहे हैं और उन्हें पूरा करने के लिए बच्चों पर दबाव बना रहे हैं उससे गंभीर संकट खड़ा हो गया है। भविष्य तय करने की नीति युवाओं की जिंदगी लिए घातक साबित हो रही है। अभिभावकों द्वारा बच्चों पर जबरदस्ती थोपे जा रहे विकल्प आज आत्महत्या का कारण बनते जा रहे हैं। भारत में 15 से 29 साल की उम्र के किशोरों और युवा वयस्कों के बीच आत्महत्या की दर सबसे अधिक है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश में युवाओ के आत्महत्या के आंकड़े सबस ज्यादा हैं। नेशनल हेल्थ प्रोफाइल रिपोर्ट के अनुसार परीक्षा में विफलता देश में आत्महत्याओं के शीर्ष दस कारणों में से एक है, जबकि पारिवारिक समस्या शीर्ष तीन में है।

मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों के अनुसार युवाओं में आत्महत्या के बढ़ते आंकड़ों का मुख्य कारण है डर से आत्महत्या करना, क्योंकि आज अच्छे नतीजे और माता-पिता के दबाव को बच्चे बर्दाश्त नहीं कर पाते और यही दबाव धीरे-धीरे छात्रों, बच्चों के लिए डर की स्थिति में परिवर्तित होने लगता है और मौत का कारण बन जाता है। माता-पिता को समझना होगा कि बेहतर भविष्य के लिए वे बच्चों पर पढ़ाई के प्रति दबाव और डर की स्थिति न बना कर उन्हें उनकी अभिरुचि के अनुसार उनके भविष्य के चुनाव करने का मौका दें।
’अमित कुमार, दिल्ली विवि

चोरी बनाम पत्रकारिता
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा व महत्त्वपूर्ण स्तंभ है जो हमेशा सत्ता को उसकी जिम्मेदारियों और दायित्वों का एहसास दिलाती रहती है। छह मार्च को रफाल से संबंधित ‘द हिंदू’ अखबार में एक खोजी रपट छपी, जिसमे रफाल सौदे में बैंक गारंटी से संबंधित कुछ विशेष तथ्यों को उजागर किया गया था। संयोग से इसी दिन रफाल की पुनर्विचार याचिका की सुनवाई थी और याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में इस खबर को भी आधार बनाया जिस पर सरकार के वकील ने कड़ी आपत्ति जताई और न्यायालय को बताया जिन दस्तावेजों के आधार पर खबर छापी गई है, वे रक्षा मंत्रालय से चोरी हुए हैं। लेकिन न्यायालय ने कहा कि यदि हासिल किए गए दस्तावेजों में थोड़ी भी ‘प्रासंगिता’ है और यदि इससे न्यायालय को सत्य की जांच करने में सहायता मिलती है तो दस्तावेजों को हासिल करने का स्रोत ज्यादा महत्त्व नहीं रखता। इसके बाद द हिंदू के खिलाफ कार्रवाई की धमकी भी दी गई।

यहां महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि ऐसी खबर जिससे न्याय मिलने में आसानी होती हो या कोई भ्रष्टाचार उजागर होता है तो क्या इसे दबाना उचित है? जिसे सरकार चोरी कह रही है असल मे उसे पत्रकार जगत में ‘खोजी पत्रकारिता’ कहा जाता है जिसमे ऐसे दस्तावेजों और सबूतों को इकट्ठा किया जाता है जो सरकार या किसी अधिकारी के भ्रष्ट आचरण को उजागर करने में मददगार होते हैं। ऐसे में सरकार अगर कानून का इस्तेमाल पत्रकारिता में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार करने में करती है तो यह देश में पत्रकारिता की भावना को हतोत्साहित करने का प्रयास भी होगा।
’अभिनीत सिंह ठाकुर, सिवनी (म.प्र.)

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