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चौपाल: पत्थरबाजी का हासिल

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सुरक्षा बलों की गोलियों से मारे गए सात नागरिकों के परिवारों के प्रति निश्चय ही हमारी सहानुभूति होगी, किंतु वहां के अनेक नेता ऐसे बयान दे रहे हैं कि मानो सुरक्षा बलों ने जानबूझ कर उनको मार दिया। पूरी घाटी में सुरक्षा बलों को खलनायक बनाने वाले सिर्फ अलगाववादी हुर्रियत, आतंकवादी समर्थक तत्त्व भी नहीं, मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां भी हैं।

Srinagar, Nowhatta, Clash between protesters and security forces, Indian security forces, jammu kashmir, Shopian town, south kashmir, stone pelting, stone pelterतस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Source: Reuters)

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सुरक्षा बलों की गोलियों से मारे गए सात नागरिकों के परिवारों के प्रति निश्चय ही हमारी सहानुभूति होगी, किंतु वहां के अनेक नेता ऐसे बयान दे रहे हैं कि मानो सुरक्षा बलों ने जानबूझ कर उनको मार दिया। पूरी घाटी में सुरक्षा बलों को खलनायक बनाने वाले सिर्फ अलगाववादी हुर्रियत, आतंकवादी समर्थक तत्त्व भी नहीं, मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां भी हैं। प्रश्न यह है कि इस मामले में सुरक्षा बलों के पास क्या विकल्प था? पुलवामा जिले के खारपोरा सिरनू में सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ होने के दौरान ही लोगों का समूह आतंकवादियों के समर्थन में नारे लगाता हुआ स्थल पर जमा हो गया और पथराव करने लगा। थल सेना प्रमुख ने घाटी में ही है यह बयान दिया था कि जो लोग पत्थरबाजी करते हैं वह जान लें कि उनके साथ भी दुश्मनों जैसा व्यवहार किया जाएगा, क्योंकि पत्थर भी हथियार है, जिससे वह हमारे ऊपर हमले करते हैं। इसके बावजूद पत्थरबाज नहीं मानें तो मूल कारण इसके पीछे निहित विचार है।
’अमन सिंह, बरेली

युवाओं की भागीदारी
युवाओं को देश की रीढ़ कहा जाता है। किसी भी देश के भविष्य को सुंदर और प्रगतिशील बनाने के लिए युवा मुख्य भूमिका निभाते हैं। युवा उसे कहा जाता हैं, जो पंद्रह से चालीस वर्ष के बीच होते हैं। हमारे देश के युवाओं ने ही हमें अंग्रेजी हुकूमत से आज़ादी दिलाई थी, जिनमें सुभाष चंद्र बोस, चंद्र शेखर आज़ाद, भगत सिंह सहित लाखों सेनानी शामिल थे। लेकिन आज का युवा वर्ग सिर्फ अपने हित साधने में ही लगा है। आजादी के बाद युवाओं के इस बदले नजरिये के कारण हमारा देश आजादी के सात दशक बाद भी विकाशील देशों की कतार में ही खड़ा है। जब तक युवा देश के विकास को लेकर अपनी सोच को नहीं बदलेंगे तब तक राष्ट्र के विकास में उनकी भागीदारी कैसे बनेगी? सरकार को भी चाहिए कि वह राष्ट्र के विकास में युवाओं की भागीदारी को बढ़ाए।
’आस मोहम्मद, आंबेडकर कॉलेज दिल्ली

न्याय की विडंबना
भारत विभिन्नताओं वाला देश है। यहां पर आर्थिक और सामाजिक विषमता समाज का एक हिस्सा है। आजादी के बाद से अगर गौर किया जाए तो एक और प्रकार की विषमता जो सबसे ज्यादा गहराई है वह है- न्यायिक विषमता। अक्सर देखने में आता रहा है कि दबंग, राजनीतिक और आर्थिक रूप से शक्तिशाली लोग न्यायिक प्रक्रिया का बेजा इस्तेमाल करते हैं। ऐसे ताकतवर लोग जब-जब अपराध में लिप्त होते हैं तो न्यायिक प्रक्रिया को अपने अनुसार चलाने की कोशिश करते हैं। हमारी न्यायिक प्रक्रिया भी इतनी लंबी, जटिल और खर्चीली हो गई है कि पीढ़ियां गुजर जाती हैं लेकिन न्याय नहीं मिलता। हाल में 1984 के सिख विरोधी दंगों पर दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला दिया है। पीड़ितों को न्याय मिलने में चौंतीस साल लग गए। 1984 के दंगो के बाद देश में कई बार दंगे हुए जो लगभग इसी प्रकृति के थे, जिसमें कुछ लोग किसी क्रिया की प्रतिक्रिया में भीड़ को उकसाते हैं और फिर भीड़ विनाशकारी ताकत बन कर घरों को जला देती है और लोगों को मारा जाता है। अगर न्यायलय में लगने वाली तरीखों की संख्या और न्यायिक प्रक्रिया में लगने वाला समय व खर्च सीमित और निश्चित हो तो शायद सभी प्रकार के जघन्य अपराधों में कुछ न कुछ कमी अवश्य आएगी और आम आदमी भी न्याय प्राप्त करने में खुद को सक्षम व संतुष्ट महसूस करेगा।
’सुनील कुमार सिंह, मेरठ

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