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कानून के बावजूद

बच्चों को यौन अपराधों के बचाने के लिए बनाए गए पोक्सो एक्ट 2012 को और कड़ा करते हुए अब इसमें बाल पोर्नोग्राफी को भी सजा के दायरे में लाया गया है। सबसे बड़ी बात, कुछ विशेष मामलों में अपराधी को मृत्यु दंड देने का भी प्रावधान कर दिया गया है। कानून बनाने का मकसद होता है अपराधियों में भय पैदा करना।

Author January 5, 2019 3:56 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

बच्चों को यौन अपराधों के बचाने के लिए बनाए गए पोक्सो एक्ट 2012 को और कड़ा करते हुए अब इसमें बाल पोर्नोग्राफी को भी सजा के दायरे में लाया गया है। सबसे बड़ी बात, कुछ विशेष मामलों में अपराधी को मृत्यु दंड देने का भी प्रावधान कर दिया गया है। कानून बनाने का मकसद होता है अपराधियों में भय पैदा करना। लेकिन भारत ही नहीं, दुनिया भर में जब भी कोई अपराध को अंजाम देता है वह किसी कानून, उसकी धारा या उपधारा के बारे में नहीं सोचता। निर्भया के समय पूरा देश एक स्वर में दोषियों को मृत्यु दंड की मांग के लिए प्रदर्शन करने लगा था मगर नतीजा क्या निकला! उस कांड के किसी भी अपराधी आज तक फांसी पर नहीं लटकाया जा सका है। अनेक राज्यों ने बच्चों के साथ यौन अपराध करने वालों के लिए फांसी की सजा मुकर्रर की है मगर हमारे देश में कार्यान्वयन का सख्त अभाव है। ठीक है, मंदसौर का उदाहरण दिया जा सकता है जहां महज नब्बे दिनों के अंदर दो अभियुक्तों को मौत का सजा सुनाई जा चुकी है। मगर आज भी 80 प्रतिशत मामलों में अभियुक्त बरी हो जाते हैं। जब तक देश में अदालतों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं होगी, पुलिस विभाग में सुधार नहीं किया जाएगा तब तक कानून चाहे कितना भी सख्त क्यों न कर लें, पीड़ितों को इंसाफ नहीं मिल पाएगा।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

इनका अवकाश
मध्यप्रदेश सरकार का पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक अवकाश देने का फैसला स्वागतयोग्य है। पुलिसकर्मी भी सामाजिक प्राणी हैं और उन्हें भी आराम की जरूरत होती है। लगातार ड्यूटी करने से उनका तनावग्रस्त होना स्वाभाविक है। कई पुलिसकर्मियों ने तनाव के चलते आत्महत्या जैसे अनुचित कदम भी उठाए हैं। अब साप्ताहिक अवकाश दिए जाने से वे अपने परिवार को न केवल समय देंगे बल्कि एक दिन आराम करने से तनाव मुक्त भी रहेंगे।
’हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

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