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समय की मांग

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद केरल के सबरीमला मंदिर में दस से पचास वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर कट्टरवादियों की हठधर्मिता के कारण अघोषित रूप से रोक लगी हुई है।

सबरीमाला मंदिर, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद केरल के सबरीमला मंदिर में दस से पचास वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर कट्टरवादियों की हठधर्मिता के कारण अघोषित रूप से रोक लगी हुई है। लगभग तीन माह पूर्व न्यायालय ने लैंगिक भेदभाव को समाप्त करते हुए महिलाओं को भी सबरीमला मंदिर में दर्शन की इजाजत दे दी थी लेकिन प्रशासनिक अमला भी न्यायालय के फैसले पर अमल कराने में विफल रहा है। निर्बाध रूप से सभी के मंदिर में प्रवेश और दर्शन की व्यवस्था सुनिश्चित हो, यह राज्य सरकार का दायित्व है। शारीरिक पवित्रता से ज्यादा मन और विचारों की शुद्धि आवश्यक है। कट्टरता के मार्ग को त्याग कर लचीला रुख अपनाना समय की मांग है।
’ललिता महालकरी, इंदौर, मध्यप्रदेश

सुधार कैसे
संसद के दोनों सदनों ने निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार (संशोधन) विधेयक पारित कर दिया है। अब राज्यों पर छोड़ा गया है कि वे आठवीं कक्षा तक बच्चों को उत्तीर्ण कर देने का नियम लागू रखना चाहते हैं या संशोधित नियम के तहत उन्हें उसी कक्षा में रखना चाहते हैं। सरकार का तर्क है कि बच्चों को फेल न करने के नीति बदलने का आग्रह 25 राज्य सरकारों ने किया था। सरकार दावा करती है कि इस नीति से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा। मगर यह होगा कैसे? क्या हमने स्कूलों में तमाम मूलभूत सुविधाओं को बहाल कर दिया है? क्या शिक्षकों के रिक्त पड़े नौ लाख पदों पर नियुक्तियांकर दी हैं? क्या चार से आठ हजार के मानदेय पर नियुक्त अस्थायी शिक्षकों को स्थायी कर दिया है? ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है।

इससे साफ है कि अगर हम बच्चों को उचित शिक्षा दे पाने में ही सक्षम नहीं हैं तो फिर उन पर अच्छे अंक लाकर उत्तीर्ण होने का दबाव कैसे बना सकते हैं? यह दुख की बात है कि आजादी के बाद से ही हमने शिक्षा और स्वास्थ्य पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया है। हमारे यहां उचित वेतन की मांग करने पर शिक्षकों पर लाठियां बरसाई जा रही हैं जबकि पश्चिमी देशों में शिक्षकों को अतिविशिष्ट व्यक्तिसमझा जाता है। मेरे खयाल से यह संशोधन जल्दबाजी में किया गया है।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

बड़ा मौका
अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध से भारतीय उद्योग जगत को बड़ा मौका मिल सकता है। अमेरिका ने चीन की 260 अरब डॉलर की वस्तुओं पर शुल्क बढ़ा कर चीन के साथ शुल्क-युद्ध छेड़ दिया है। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिका की 100 अरब डॉलर की वस्तुओं पर शुल्क बढ़ा दिया है। इस युद्ध से अब भारत अमेरिकी बाजार में अपना कब्जा स्थापित कर सकता है, क्योंकि इन दोनों देशों में उत्पादन-विस्तार सीमित है, लेकिन भारत में सीमित नहीं है। दोनों देशों को टेक्सटाइल, फार्मा और केमिकल क्षेत्रों के साथ-साथ सरसों, सोयाबीन, मक्का और अन्य उत्पादों का निर्यात हो सकता है। इससे भारत में निवेश के रास्ते भी खुल सकते हैं।
’विविधा, नई दिल्ली

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