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इंसाफ की खातिर

जजों की कमी से जूझ रही न्यायपालिका में युवाओं को आकर्षित करने के लिए नीति आयोग ने सुझाव दिया है कि निचली अदालतों में न्यायाधीशों के चयन के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन किया जाए। नीति आयोग का कहना है कि इस कदम से कानून की बेहतर जानकारी रखने वाले प्रतिभाशाली और योग्य युवा आकर्षित होंगे।

Author January 8, 2019 4:44 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

जजों की कमी से जूझ रही न्यायपालिका में युवाओं को आकर्षित करने के लिए नीति आयोग ने सुझाव दिया है कि निचली अदालतों में न्यायाधीशों के चयन के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन किया जाए। नीति आयोग का कहना है कि इस कदम से कानून की बेहतर जानकारी रखने वाले प्रतिभाशाली और योग्य युवा आकर्षित होंगे। देशभर की जिला अदालतों में इस समय लगभग पौने तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं। इन मुकदमों के तेजी से निपटारे के लिए इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर न्यायिक सुधारों की आवश्यकता है। कानून मंत्रालय का मानना है कि अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के माध्यम से देश में सक्षम न्यायाधीशों का एक ‘पूल’ तैयार किया जा सकता है जिनकी सेवाएं विभिन्न राज्यों में ली जा सकती हैं। अधीनस्थ न्यायपालिका में इस समय न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के 21,320 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से करीब 25 प्रतिशत रिक्त हैं। अखिल भारतीय सेवा के अभाव में उतनी नियुक्तियां नहीं हो पा रही हैं, जितने न्यायाधीशों की जरूरत है।

देश में लंबित अदालती मामलों में 80 फीसद से अधिक जिला और अधीनस्थ अदालतों में हैं। यानी प्रत्येक न्यायाधीश के पास औसतन 1,350 मामले लंबित हैं, जो प्रति माह 43 मामलों को मंजूरी देता है। 2011 की जनगणना के आधार पर प्रति 10 लाख लोगों पर लगभग 17.72 जज हैं। यह अमेरिका की तुलना में सात गुना खराब है। उल्लेखनीय है कि विधि आयोग ने अपनी 120 वीं रिपोर्ट में सिफारिश की है कि प्रति 10 लाख जनसंख्या पर न्यायाधीशों की संख्या 50 होनी चाहिए। इसके लिए स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाकर तीन गुना करनी होगी। अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन से पहला लाभ तो यह है कि जजों की नियुक्ति में अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के समान निष्पक्ष एजेंसी की भूमिका होगी। इससे न्यायिक सेवा में प्रतिभावान विधि स्नातक शामिल किए जा सकेंगे, जो सामान्यत: न्यायिक सेवा में भर्ती न होकर सरकारी और निजी क्षेत्र में अन्य ऐसे पदों की तलाश में रहते हैं जहां उन्हें ज्यादा आर्थिक लाभ मिल सके। यदि केंद्रीय लोक सेवा आयोग से भर्ती कराई जाएगी तो विभिन्न केंद्रीय सेवाओं के समान वेतन, भत्ते और सेवाएं न्यायिक सेवा में भी उपलब्ध होंगे, इसलिए अनेक प्रतिभाशाली व्यक्ति न्यायिक सेवा में नियुक्ति पाने के लिए प्रतियोगिता में शामिल होंगे। न्यायिक सेवा बनने से न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में जो पक्षपात के आरोप आए दिन लगते हैं वे भी नहीं लगेंगे।

देश की जिला अदालतों में अभी जो स्थिति है, उसमें अखिल भारतीय न्यायिक सेवा निश्चित ही न्यायपालिका को अधिक जवाबदेह, दक्ष, पेशेवर एवं पारदर्शी बनाकर न्याय की गुणवत्ता और पहुंच में वृद्धि करेगी। नवनियुक्त जजों को स्थानीय भाषा सिखा कर अथवा निचली अदालतों के जजों का केवल राज्य के अंदर ही स्थानांतरण करने जैसे प्रावधानों से राज्यों की चिंताओं को दूर किया जा सकता है ताकि राज्य एवं उच्च न्यायालय इस सेवा की स्थापना को सहर्ष स्वीकार करें। यदि ऐसा हो जाता है तो न्यायिक सुधारों की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।
’कैलाश एम बिश्नोई, जोधपुर

बेरोजगारों से छल
बेरोजगारी देश की एकबड़ी समस्या है जिसका समाधान ढंूढ़ने में असमर्थ सरकारें नए-नए जुमले गढ़ कर नौजवानों को भूल-भुलैया में भटकाती हैं। उन्हें कभी निवेशकों और उभरते बाजारों का सपना दिखाया जाता है तो कभी सियासत की बोतल से स्थानीयता का जिन्न निकल आता है। यह भी तय नहीं होता कि कर्ज के बाजार से निकला रोजगार युवाओं को तरक्की के राजमार्ग पर ले जाएगा या कर्ज के दलदल में! कुछ होनहार युवा विदेशों का रुख कर लेते हैं तो कुछ सडकों पर भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं। मौका देख सियासत बिना देरी किए ‘बाहरियों’ का हौवा और ‘प्रतिशत’ का हिसाब बता कर बेरोजगारों को बरगलाने में जुट जाती है। मसला चाहे मराठी मानुष का हो या यूपी-बिहार वालों की कथित घुसपैठ का, भौंहें तो दिल्ली से असम तक की भी तन जाती हैं। प्रदेश चाहे उत्तर हो या मध्य, राजनीतिक झांसे के तरीके सबके एक जैसे हैं। सरकारी संरक्षण में आकर्षक रोजगार पैदा करना होगा वरना नीतियों का वर्तमान पीढ़ियों के भविष्य को कर्जदार बना कर छोड़ेगा।
’एमके मिश्रा, रातू, रांची, झारखंड

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