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सुधार का इंतजार

आर्थिक मोर्चे पर मौजूदा केंद्र सरकार का प्रदर्शन बुरा नहीं है, लेकिन आम लोगों और कॉरपोरेट जगत को सरकार से और अधिक सक्रियता की उम्मीद है। हालांकि इस बात को लेकर थोड़ी बेचैनी बढ़ रही है कि कोई बदलाव क्यों नहीं हो रहा है और जो बदलाव हो रहे हैं उनका असर जमीनी स्तर पर पहुंचने में इतना वक्त क्यों लग रहा है?

Author January 5, 2019 4:06 AM
प्रतीकात्मक फोटो

आर्थिक मोर्चे पर मौजूदा केंद्र सरकार का प्रदर्शन बुरा नहीं है, लेकिन आम लोगों और कॉरपोरेट जगत को सरकार से और अधिक सक्रियता की उम्मीद है। हालांकि इस बात को लेकर थोड़ी बेचैनी बढ़ रही है कि कोई बदलाव क्यों नहीं हो रहा है और जो बदलाव हो रहे हैं उनका असर जमीनी स्तर पर पहुंचने में इतना वक्त क्यों लग रहा है? लोगों को उम्मीद थी कि विनिर्माण में तेजी आएगी, नौकरियों में इजाफा होगा और आर्थिक गतिविधियों में अचानक बढ़ोतरी हो जाएगी तो उनकी ये अपेक्षाएं कुछ ज्यादा ही ऊंची थीं। भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की समस्याएं गहरी हैं और ये साढ़े चार साल में दुरुस्त नहीं की जा सकीं तो कब की जा सकेंगी? चीजें थोड़ी धीमी जरूर हैं लेकिन ऐसा भारत में जड़ता की वजह से है जहां किसी भी बदलाव को शुरू में प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है। 2018-2019 के बजट में खेती और किसानों को प्राथमिकता दी गई थी पर विश्व की सबसे अधिक युवा शक्ति के रूप में उभरा भारत बेरोजगारी, जनसंख्या वृद्धि और प्रदूषण जैसी विकट समस्याओं का सामना कर रहा है जिन पर काबू पाने में सरकारी और निजी संस्थाएं विफल हो रही हैं।

विभिन्न कारोबारी क्षेत्रों में बिक्री और मांग में वृद्धि के सुअवसर पैदा करने होंगे जो बेहतर क्षमता-इस्तेमाल और निवेश बढ़ने की उम्मीद जगाने में मदद करते हैं। गैर टिकाऊ उपभोक्ता सामान, दोपहिया और ट्रैक्टर क्षेत्र में ग्रामीण मांग में सुधार में इजाफा जरूरी है। सरकार के कई अभियानों मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत, स्वच्छ ऊर्जा, स्टार्टअप इंडिया में तेजी लानी होगी। कारोबारी सुगमता में 23 पायदानों की जो सफलता मिली है वह सराहनीय पर यह काफी नहीं है। आर्थिक वृद्धि दर 7.3 फीसद को 8.0 फीसद से ऊपर ले जाने के प्रयास करने होंगे। मौजूदा दौर में बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े दो-तीन मुद्दे हैं, जिन्हें अलग-अलग तरीके से देखा जाना चाहिए। पहला यह कि अगर गैर-निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) का स्तर देखें तो बीते दिनों सकल एनपीए 17 फीसद के पास पहुंच चुका था। यह स्थिति लगातार बिगड़ती ही जा रही है। कुछ दिन पहले आई रिपोर्ट में एनपीए सितंबर 2018 में घट कर 10.8 फीसद पर आ गया जो मार्च 2018 में 11.5 फीसद पर था हालांकि यह नाकाफी सुधार है। इसके अतिरिक्त खनन, खाद्य प्रसंस्करण और विनिर्माण क्षेत्रों में दबाव बढ़ रहा है जिसमें सुधार की उम्मीदें हैं। जब हम एनपीए के आंकड़ों को देखते हैं तो बैंकिंग क्षेत्र की स्थितियां बद से बदतर होती नजर आती हैं।

नए कारोबारी साल में बड़ी-बड़ी घोषणाओं की बजाय कुछ खामियों को ठीक करने की जरूरत है। कोल और गैस क्षेत्रों को नजरअंदाज किया गया है जिन पर ध्याना दिया जाना चाहिए। इससे अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी। नवागंतुक कारोबारियों को जीएसटी की जटिलता ने उलझा कर रख दिया है। ऐसे तमाम कारोबारी मुद्दे हैं जिनमें सुधार की उम्मीद का कारोबार जगत नए वर्ष में इंतजार कर रहा है।
’विवेकानंद मिश्र, जोगिया, सांडा, देवरिया

इंटरनेट की लत
शशांक द्विवेदी का लेख ‘डिजिटल लत और बढ़ता संकट’ (2 जनवरी) पढ़ा। आज सचमुच बच्चे और युवा इंटरनेट की गिरफ्त में आ चुके हैं। सुबह से देर रात तक इंटरनेट का प्रयोग करना अब आम बात है। कुछ युवा अपने साथ ‘पावर बैंक’ लेकर चलते हैं, जैसे ही फोन की बैटरी कम हुई मानो उनकी भी बैटरी भी कम हो गई! स्मार्टफोन की लत एक बीमारी बनती जा रही है। एम्स में तो इसका एक अलग से विभाग बना दिया गया है जिसमें मरीज भी आने शुरू हो चुके हैं। जिस प्रकार आज पूरा विश्व प्रदूषण से लड़ाई लड़ रहा है ठीक वैसी ही लड़ाई इंटरनेट की लत से भी लड़नी पड़ रही है।
इन दिनों युवा हों या बच्चे, अपने पास बैठे व्यक्ति से बात तक नहीं करते बल्कि इंटरनेट के जरिए दूर बैठे किसी शख्स से बात कर रहे होते हैं हालांकि उन्हें पता भी नहीं होता कि जिससे वे बात कर रहे हैं वह है भी या नहीं। वे वास्तविकता को छोड़ आभासी दुनिया में खो से गए हैं। हम सबको इसके खिलाफ मिल कर आवाज उठानी होगी। अभिभावकोंकी इसमें महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी बनती है।
’आशीष, रामलाल आनंद कॉलेज, दिल्ली

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