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विकास की भेंट

प्रकृति ने हमें उपहार के रूप में जल, जंगल और जमीन भेंट किए हैं जिनके संरक्षण की जिम्मेदारी संपूर्ण समाज की है। जीवन के लिए जीव को जल, जंगल और जमीन में सामंजस्य स्थापित करना पड़ता है ताकि पारिस्थितिकीय संतुलन अनुकूल बना रहे लेकिन मनुष्य ने विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति के इन उपहारों का उपहास उड़ाना शुरू कर दिया है।

Author Published on: January 3, 2019 4:05 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (Express Photo by Karma Sonam Bhutia)

प्रकृति ने हमें उपहार के रूप में जल, जंगल और जमीन भेंट किए हैं जिनके संरक्षण की जिम्मेदारी संपूर्ण समाज की है। जीवन के लिए जीव को जल, जंगल और जमीन में सामंजस्य स्थापित करना पड़ता है ताकि पारिस्थितिकीय संतुलन अनुकूल बना रहे लेकिन मनुष्य ने विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति के इन उपहारों का उपहास उड़ाना शुरू कर दिया है। आज हम विकास के लिए अपने ही भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं। उच्चतम न्यायालय के अरावली पर्वतमाला में अवैध खनन पर रोक के फैसले ने हमें फिर से सोचने के लिए मजबूर कर दिया। पर्यावरण संरक्षण के लिए देश में पर्यावरण मंत्रालय और राज्यों में पर्यावरण विभाग कार्यरत हैं लेकिन कारपोरेट घरानों, राजनेताओं और नौकरशाही की तिकड़ी ने पर्यावरण नियमों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

हमारे मौलिक कर्तव्यों में पर्यावरण की रक्षा और संवर्द्धन का कर्तव्य भी सम्मिलित है लेकिन हम इसके प्रति अनजान हैं। इसका खमियाजा हमें कभी केरल की बाढ़ त्रासदी के रूप में तो कभी राजस्थान के सूखे के रूप में भुगतना पड़ता है। दिल्ली में ही हवा जहरीली नहीं है, सारे महानगर इसकी चपेट में आ चुके हैं। यह सब हमारे विकास की मार है। हम जब अच्छे जीवन के लिए मौलिक अधिकारों की मांग करते हैं, तो क्या अच्छे जीवन के लिए पर्यावरण संरक्षण के दायित्व को भी नहीं निभाना चाहिए?

हमें पर्यावरण संरक्षण को दायित्व के अलावा अधिकार के रूप में भी देखना चाहिए, मौलिक अधिकार समझना चाहिए। यह असल में हमारे सर्वोत्तम जीवनयापन के अधिकार की मांग है क्योंकि जीने की स्वतंत्रता का अधिकार सीधे हमारे पारिस्थितिकीय संतुलन से जुड़ा है। यदि अब भी इस दिशा में कठोर कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में हमें तमाम दुष्परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। उदाहरण के रूप में गंगा, यमुना, ताप्ती, नर्मदा जैसी नदियां हैं, अरावली, विंध्याचल जैसे पर्वत हैं जो हमारे अंधाधुंध विकास की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। इसके मद्देनजर हमें पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अविलंब ठोस और सकारात्मक कदम उठाने चाहिए।
’योगेश जांगिड़, काशी हिंदू विश्वविद्यालय

मुक्ति कब
संपादकीय ‘स्त्री के हक में’ (29 दिसंबर) पढ़ा। तीन तलाक को सुप्रीम कोर्ट कभी का गलत कह चुका है। सरकार इस बाबत कानून बनाने में अब तक सफल नहीं हुई है, पर वह पहलकदमी जरूर कर रही है। इस बीच जनवरी 2017 के बाद अब तक तीन तलाक के 477 मामले सामने आ चुके हैं। मुसलिम महिला विवाह संरक्षण अधिकार विधेयक-2018 को लोकसभा की मंजूरी मिल गई है। अब राज्यसभा में इस विधेयक को पास कराना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। विपक्ष इस बिल के सजा संबंधी प्रावधानों को लेकर कई सवाल उठा रहा है। दूसरी ओर धर्म के ठेकेदार भी विपक्ष के साथ ताल ठोक रहे हैं। ऐसे में राज्यसभा में बिल पास होने की राह में कई रोड़े सामने आते दिख रहे हैं। आखिर मुसलिम महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति कब मिलेगी?
’अणदाराम बिश्नोई, नई दिल्ली

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