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बिन मांगी मुराद

सामान्य वर्ग को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में आर्थिक आधार पर दस फीसद आरक्षण देने का कानून बनने से एक नई बहस छिड़ गई है। क्या यह सामाजिक न्याय की दिशा में एक कदम है या फिर कोई नया राजनीतिक पैंतरा है? आरक्षण विरोधियों का यही तर्क हुआ करता था कि आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए।

Author January 15, 2019 4:38 AM
प्रतीकात्मक फोटो। (Photo-Reuters)

सामान्य वर्ग को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में आर्थिक आधार पर दस फीसद आरक्षण देने का कानून बनने से एक नई बहस छिड़ गई है। क्या यह सामाजिक न्याय की दिशा में एक कदम है या फिर कोई नया राजनीतिक पैंतरा है? आरक्षण विरोधियों का यही तर्क हुआ करता था कि आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए। इस मुद्दे पर आज न तो कोई आंदोलन था, न ही सवर्णों की कोई मांग। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव के समय सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक आधार पर आरक्षण को संविधान के विरुद्ध बताया था पर अब तो संविधान संशोधन हो गया। इसके द्वारा संविधान में अनुच्छेद 15 (6) और अनुच्छेद 16 (6)जोड़ा गया, जिसे सुप्रीम कोर्ट में इस आधार पर चुनौती दी गई है कि वह संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध है। आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग की परिभाषा को भी चुनौती दी गई है क्योंकि उसे तय करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर है। न्यायालय द्वारा सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर आरक्षण देने पर 50 फीसद की बंदिश लगी हुई है। तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक आदि राज्यों ने उसे तोड़ा जरूर है पर वह न्यायालय में विवादित है। लेकिन आर्थिक आधार पर दिया जाने वाला आरक्षण उस लक्ष्मण रेखा के बाहर है।

तो क्या अब 50 फीसद वाली बंदिश निष्प्रभावी हो जाएगी? केशवानंद भारती मुकदमे 1973 में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को संविधान का मूल ढांचा माना गया था। आर्थिक आधार पर आरक्षण देने वाला यह संशोधन देश के गरीब सवर्ण और गरीब मुसलिमों को आर्थिक न्याय दिलाने की दिशा में एक कदम है। तो क्या न्यायालय को अपना निर्णय बदलना पड़ेगा? जो हो, पर इसका राजनीतिक लाभ संभवत: राजग सरकार और भाजपा को अवश्य मिल सकता है। यदि सरकार को हिंदू और मुसलिम दोनों ही समुदायों में गरीबों का वास्तविक हित करना है तो गरीबी की सीमा रेखा को और नीचे ले जाना होगा, अर्थात क्रीमी लेयर निर्धारित करने वाली राशि को हटाना पड़ेगा। गरीब सवर्णों, मुसलिमों और अन्य अल्पसंख्यकों को आर्थिक आधार पर आरक्षण से बिन मांगी मुराद मिली है। उनके गरीब परिवारों में आशा की एक किरण जगी है।

सरकार द्वारा सवर्णों और मुसलिमों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देकर संभवत: उस वैमनस्य को भी कम करने की कोशिश हुई है जिसमें 1989 में मंडल बनाम कमंडल के कारण वृद्धि हुई थी। वैसे गौरतलब यह भी है कि आरक्षण न तो नवयुवकों की रोजगार की समस्या का समाधान है और न ही सामाजिक न्याय लाने का कोई ब्रह्मास्त्र। यह वोट बैंक की राजनीति अवश्य है।
’अमन सिंह, प्रेमनगर,बरेली, उत्तर प्रदेश

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