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चौपालः मदद की दरकार

बनर्जी ने केंद्र सरकार के प्रयासों को सराहते हुए कहा कि एमएसएमई के लिए मासिक किस्तें चुकाने के लिए तीन महीने की छूट देना अच्छा कदम है। लेकिन यह भी हो सकता था कि सरकार कर्ज माफ कर खुद जिम्मेदारी ले लेती तो काफी राहत मिल पाती।

May 8, 2020 1:45 AM
केंद्र सरकार को इस वक्त छोटी कंपनियों के कर्ज माफ करने के बारे में विचार करना चाहिए।

नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी ने निजी कंपनियों की हालत खराब होने के संदर्भ में बताया है कि इन कंपनियों को बचाने का एकमात्र बेहतर रास्ता कर्ज माफी हो सकता है। साथ ही हर गरीब के हाथ में नगदी पहुंचाने की जरूरत भी उन्होंने बताई है। ऐसे में केंद्र सरकार को इस वक्त छोटी कंपनियों के कर्ज माफ करने के बारे में विचार करना चाहिए और नगदी के जरिए मदद देनी चाहिए। बनर्जी ने केंद्र सरकार के प्रयासों को सराहते हुए कहा कि एमएसएमई के लिए मासिक किस्तें चुकाने के लिए तीन महीने की छूट देना अच्छा कदम है। लेकिन यह भी हो सकता था कि सरकार कर्ज माफ कर खुद जिम्मेदारी ले लेती तो काफी राहत मिल पाती। ऐसे में गरीब तबके के लिए अब भारत सरकार द्वारा अस्थायी राशन कार्ड की व्यवस्था शुरू होनी चाहिए, क्योंकि गरीबों, असहायों और जरूरतमंद लोगों को देने के लिए हमारे पास पर्याप्त मात्रा में दाल, तेल इत्यादि हैं। यह कदम इसलिए आवश्यक होगा, क्योंकि अभी गरीब तबका सरकार की सुविधाओं से वंचित है। ऐसे में राशन कार्ड आधारित प्रणाली उनके लिए कारगर साबित हो सकती है।
-कशिश वर्मा, दिल्ली

मजदूरों पर मार
इस वक्त देश में सबसे ज्यादा मार अगर किसी पर पड़ रही है, तो वे प्रवासी मजदूर हैं, जो पिछले डेढ़ महीने से जगह-जगह फंसे पड़े हैं, जिनके पास काम-धंधा तो है ही नहीं, खाने-पीने को भी कुछ नहीं बचा है। प्रवासी मजदूरों की रक्षा के मोर्चे पर सरकारें एकदम लापरवाह साबित हुई हैं। होना यह चाहिए था कि सरकारें इन मजदूरों को गृह राज्य जाने से रोकतीं और उन्हें वहीं पर खाने और रहने की सुविधाएं मुहैया करातीं। लेकिन सरकारों की लापरवाही देख कर ही मजदूर अपने गृह प्रदेशों में जाने को मजबूर हुए हैं। लेकिन सवाल है कि बंदी खत्म होने के बाद क्या होगा। कैसे ये लौट पाएंगे। मजदूरों के अभाव में कैसे कल-कारखाने शुरू होंगे। राज्य सरकारों को मजदूरों की समस्याओं का तार्किक हल निकालने के बारे में तत्काल विचार करना चाहिए।
-अभिषेक पाल, प्रयागराज

भारी पड़ी शराब
पूर्णबंदी में सुरक्षित दूरी का पैमाना सरकार के ही एक गलत निर्णय के कारण अब गले की हड्डी बन गया है। जहां-जहां शराब की दुकानें खोली गई हैं, वहां पर उन दुकानों के सामने लंबी लाइनें लग रही हैं। दिल्ली में तो लोगों ने इसे जैसे सिरे से ही खारिज कर दिया। जो लोग राशन के लिए भीख मांग रहे थे, वे शराब के डिब्बे खरीद कर ले जाते दिखे। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारे यहां सरकारें शराबबंदी सिर्फ इसलिए नहीं करतीं, क्योंकि उन्हें उससे बड़ा राजस्व मिलता है और सिगरेट की तरह शराब की बोतल पर कभी यह नहीं लिखा जाता कि यह आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

जो सरकारें लोगों को सब्जी और जरूरी सामान खरीदने के लिए घरों से बाहर निकलने को रोक रही हैं, उन्हीं सरकारों ने शराब की दुकानों पर लंबी-लंबी कतारें लगवा दी हैं। इस पर सब मौन हैं, क्योंकि सरकारों का राजस्व प्रभावित होता है। यह जनसामान्य के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। कोरोना एक बड़ी आपदा है और इसमें सरकार अगर कठोर निर्णय नहीं लेगी तो कौन लेगा। जनता तो भेड़ चाल में चलती है। सरकार अपने राजस्व की हानि की पूर्ति के लिए एक निर्णय ले सकती है कि जिस तरह किराना और अन्य सामान की ऑनलाइन डिलीवरी हो रही है, उसी तरह शराब की भी ऑनलाइन डिलीवरी हो और उसमें कोरोना के लिए अतिरिक्त सर चार्ज भी लगा दिया जाए, जिससे जो बहुत ही आवश्यक होगा वही उसका उपयोग करेंगे। शराब की दुकानों को बिल्कुल नहीं खोला जाना चाहिए। अगर शराब की दुकानों को खोला गया तो जनता की इतने दिनों की तपस्या भंग हो जाएगी।
-सतीश राठी, इंदौर

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