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चौपाल: आस्था के शिकारी

आज एक के बाद एक बाबा कठघरे में खड़े हैं और जेल की हवा खा रहे हैं। इसके बाद भी लोग इन फरेबी/ पाखंडियों के शिकार हो रहे हैं, जो बहुत अफसोसनाक है। आखिर कब तक इन बाबाओं के पाखंड के आगे हम आस्था और श्रद्धा के नाम पर नतमस्तक होते रहेंगे?

Author Updated: September 15, 2018 5:59 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

हमारे देश में धर्म व ईश्वर प्रति आस्था और अंधविश्वास की जड़ें बहुत गहरी हैं। इसी आस्था और श्रद्धा के कारण राम नाम का चोला ओढ़े ढोंगी व पाखंडी बाबा श्रद्धालुओं का शोषण करते हैं। कोई प्रवचन के नाम पर, कोई ईश्वर के नाम पर, कोई तंत्र-मंत्र के नाम पर तो कोई भविष्य बांचने के नाम पर अपने-अपने तरीके से लोगों को शिकार बना रहे हैं। इन फरेबी बाबाओं के प्रति अंधी आस्था बहुत चिंताजनक है। आज एक के बाद एक बाबा कठघरे में खड़े हैं और जेल की हवा खा रहे हैं। इसके बाद भी लोग इन फरेबी/ पाखंडियों के शिकार हो रहे हैं, जो बहुत अफसोसनाक है। आखिर कब तक इन बाबाओं के पाखंड के आगे हम आस्था और श्रद्धा के नाम पर नतमस्तक होते रहेंगे?

’हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

राहत बनाम न्याय
बिहार में भीड़ की हिंसा के पीड़ितों को राहत राशि देने का फैसला सराहनीय है। असल में पीड़ित परिवारों के दुख की भरपाई कर पाना आसान नहीं है लेकिन दुख की घड़ी में आर्थिक मदद से उन्हें कुछ हौसला जरूर मिलेगा। दूसरा पहलू यह भी है कि क्या यह भीड़ द्वारा मार दिए गए निर्दोषों की मौत का सौदा तीन लाख में करने की कोशिश तो नहीं? राहत राशि भीड़ की हिंसा से पीड़ित लोगों का हक है, उन्हें वह हक मिलना ही चाहिए लेकिन हत्यारी भीड़ को सजा भी तो मिलनी चाहिए। राहत राशि देकर इतिश्री कर लेना पीड़ितों के साथ अन्याय है। पीड़ित परिवारों को समय पर न्याय मिले, सरकार को इसका भी विशेष खयाल रखना होगा।
’जफर अहमद, रामपुर डेहरू, मधेपुरा, बिहार

किसका हाथ
यदि आप राजनीतिक होना चाहते हैं तो आपको दो तरह के तकिया कलाम अवश्य आने चाहिए। पहला यह कि जब भी आपके या आपके दल ऊपर कोई आरोप लगे तो मीडिया के सामने बड़ी विनम्रता से कह दीजिए, ‘ये हमें फंसाने के लिए विपक्ष की चाल है’ और दूसरा यह कि जब आपके दल का कोई नेता मीडिया के सामने अपशब्दों को भी शर्मिंदा कर दे तब आप बड़े भले मानुष बनकर अपने साथी नेता के बारे में कह दीजिए कि ‘ये उनके निजी विचार हैं और इनका पार्टी से कोई संबंध नहीं है’।

आज तक यह समझ नहीं आया कि उस ‘निजी विचार प्रकट करने वाले नेता’ को पार्टी से तब तक क्योंं नहीं निकाला जाता जब तक कि पार्टी को नुकसान पहुंचने के संकेत नहीं दिखें। राजनीति के इन दाव-पेचों में भी कई पेच हैं जिनमें पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें भी शामिल हैं। इन दिनों बड़े भोलेपन से कहा जा रहा है कि ‘अंतरराष्ट्रीय कारणों के चलते तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और इसमें सरकार का कोई हाथ नहीं है’। यह बात अमेरिका के बदले हुए व्यवहार के चलते ठीक भी हो सकती है लेकिन तब यह भी मान लेना चाहिए कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें 46 डॉलर प्रति बैरल से नीचे थीं तब भी भारत में पेट्रोल-डीजल सस्ते नहीं हुए थे और कम से कम उसमें सरकार का हाथ अवश्य था!
’प्रेमपाल, दिल्ली

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