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चौपाल: प्रकृति के साथ

दरअसल, अगर हम पर्यावरण को स्वच्छ रखना चाहते हैं तो न्यूनतम उपभोग के सिद्धांत को अपनाना होगा। हम दैनिक जीवन में सुबह से शाम तक तमाम ऐसी चीजों का उपभोग करते हैं जो अत्यावश्यक नहीं हैं।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थॉमस रॉबर्ट माल्थस ने लिखा था, ‘प्रकृति की मेज सीमित संख्या में अतिथियों के लिए सजाई गई है। जो बिन बुलाए आएंगे वे भूखों मरेंगे।’ इसका अर्थ हम दो रूपों में लगा सकते हैं। पहला, भोजन की आपूर्ति और दूसरा, प्राण वायु आक्सीजन की आपूर्ति। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। बढ़ती जनसंख्या के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है भोजन की आपूर्ति और स्वच्छ वातावरण में जीवन, जो आज भी पूर्णरूप से सर्वत्र संभव नहीं है। लेकिन आने वाले समय में स्थिति और भी भयावह होने वाली है। इस संदर्भ में हाल ही में ‘मूडी एनालिटिक्स’ द्वारा वैश्विक अर्थव्यवस्था पर जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान का आकलन अत्यंत चिंताजनक है। इसके नतीजे रेखांकित करते हैं कि जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा असर कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। जलवायु परिवर्तन का मूल कारण है पर्यावरण प्रदूषण। प्रदूषण का बढ़ता स्तर ही मौसम की अनियमितता का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कारक है। तापमान में वृद्धि का सबसे प्रतिकूल असर कृषि पैदावार पर पड़ेगा जिससे देश को गेहूं, मक्का व अन्य फसलों की कम पैदावार की मार झेलनी पड़ेगी।

दरअसल, अगर हम पर्यावरण को स्वच्छ रखना चाहते हैं तो न्यूनतम उपभोग के सिद्धांत को अपनाना होगा। हम दैनिक जीवन में सुबह से शाम तक तमाम ऐसी चीजों का उपभोग करते हैं जो अत्यावश्यक नहीं हैं। जिनके बिना भी हमारा जीवन सुचारू रूप से चल सकता है लेकिन अंशत: आदतन तो कभी-कभार दिखावे के लिए भी ऐसी चीजों का प्रयोग हम करते हैं जो पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं। जैसे, आदतन बाहर निकलते ही पानी की बोतल खरीदना, जिसे हम घर से लेकर भी जा सकते हैं। हर छोटी चीज के लिए दुकानदार से प्लास्टिक की थैली की मांग करना, सार्वजनिक परिवहन सुविधा होते हुए भी अपनी कार से चलना या जरूरत न होने पर भी एयर कंडीशनर चलाना।

कागज हो या प्लास्टिक, दोनों का उपयोग प्रकृति के लिए हानिकारक है। एक के निर्माण में पेड़ों की बलि दी जाती है तो दूसरे के निपटारे में पर्यावरण की। सुबह से शाम तक ऐसी तमाम ऐसी चीजे हैं जिनका उपयोग गैर-जरूरी है लेकिन हम आदतन मजबूर हैं। हमें अपनी आदत बदलनी होगी। उपभोग सिर्फ उन्हीं वस्तुओं का करना होगा जिनकी आवश्यकता होगी, न कि इच्छा। जरूरत और इच्छा के अंतर को समझना होगा।
’शुभेंद्र सिंह, नई दिल्ली

स्वर्ण परी
हिमा दास भले ही मुंह में चांदी की चम्मच लिए न पैदा हुई हों लेकिन पैरों से सोना रौंदने की काबिलियत रखती हैं। देश एक तरफ जहां बेटियों की सुरक्षा के लिए फिक्रमंद है तो वहीं हिमा बेफिक्री से दुनिया को पैरों से नापने चल पड़ी हैं। एक पखवाड़े में छह स्वर्ण पदक झटकना कोई बच्चों का खेल नहीं मगर हिमा ने यह कारनामा कर दिखाया। आज पूरा देश उन पर गर्व कर रहा है। हिमा की सफलता को सलाम।
’एमके मिश्रा, रातू, रांची

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