ताज़ा खबर
 

चौपाल: किसकी भाषा व सवालों पर परदा

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाने के लिए मुसलिम व्यक्ति की नियुक्ति पर हंगामा मचा है।

सवाल उठने लगा है कि फिर मुसलमान संस्कृत क्यों नहीं पढ़ सकता!

‘मजहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना’। उर्दू के महशूर शायर और कवि अल्लामा इकबाल की ये पक्तियां बहुत ही सुंदर और देश प्रेम की भावना को जागृत करती है। मगर देश मे कुछ ऐसी विचारधारा मानने वाले लोग हैं, जो नहीं चाहते की ये पक्तियां वास्तव में जमीन पर उतरें। जिस देश में भिन्न-भिन्न धर्म-संप्रदाय के लोग रहते हैं, वहां पर कुछ ऐसी बात हो जाए जो किसी भी सूरते-हाल में सही नहीं हो। हमारे संविधान में भी सभी को समानता का अधिकार और विभिन्न धर्म संप्रदाय के लोगों को अपने तरीके से अपने आराध्य को पूजने की बात कही गई है। साथ ही विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में गुरु को सम्मान का दर्जा प्राप्त है, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो। गुरु का काम है अपने शिष्य को उच्च शिक्षा देना और उसका सही मार्गदर्शन करना, ताकि वह सद्मार्ग पर चल कर अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर सके।

हिंदी सिनेमा जगत के जाने-माने नाम नवाजुद्दीन सिद्दिकी मुजफ्फरपुर जिले के बुढ़ाना कस्बे में पैदा हुए। लगभग तीन वर्ष पहले उन्हें महाभारत के एक नाटक में भाग लेने से यह कह कर रोक दिया गया कि आप मुसलमान हैं, लिहाजा ‘महाभारत’ में हिस्सा नहीं ले सकते। और अब बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में डॉक्टर फिरोज खान की नियुक्ति के विरोध का किस्सा सामने आ गया है। उपकुलपति राकेश भटनागर और खुद संस्कृत विभाग के मुखिया उमाकांत चतुर्वेदी कह रहे हैं कि डॉक्टर फिरोज खान को संस्कृत में उनकी काबिलियत के आधार पर पढ़ाने के लिए चुना गया है।

मगर कुछ छात्र धरने पर बैठ गए कि हम किसी मुसलमान अध्यापक से संस्कृत नहीं पढ़ेंगे, क्योंकि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में एक पत्थर पर खुदा हुआ है कि वहां न मुसलमान पढ़ सकता है, न पढ़ा सकता है। जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन को आज तक वह पत्थर नहीं मिला। मगर जैसा कि देश का माहौल है, ऐसा पत्थर भले हो या न हो, वही पत्थर पर लकीर मान ली जाएगी। यह बात अपनी जगह कि डॉ फिरोज खान ने नौकरी के लिए होने वाले इंटरव्यू में दस में से दस नंबर हासिल किए, उनके पिता ने भी न सिर्फ संस्कृत पढ़ी, बल्कि वे जयपुर में एक गोशाला की देखरेख के लिए भजन गाकर चंदा जमा करते हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाने के लिए मुसलिम व्यक्ति की नियुक्ति पर हंगामा मचा है। छात्र कह रहे हैं इनसे कैसे पढ़ लें। सवाल उठने लगा है कि फिर मुसलमान संस्कृत क्यों नहीं पढ़ सकता!

’योगेंद्र गौतम ललऊ, उन्नाव

सवालों पर परदा

देश में टीवी के खबरिया चैनलों का विस्तार हुआ तो यह उम्मीद बंधी थी कि ऐसे चैनल इस माध्यम का उपयोग समाज को जागरूक करने और उसे एक विज्ञानसम्मत दृष्टिकोण देने के लिए करेंगे। इतना ही नहीं, वे भारतीय समाज में जाति और धर्म की आड़ में फैलाए जा रहे विद्वेष को जड़ से नेस्तनाबूद करने के लिए भी इस सशक्त माध्यम का इस्तेमाल करेंगे। वे नागरिकों और विशेषकर युवाओं को एक प्रगतिशील दृष्टिकोण और परिष्कृत रुचि से लबालब कर भारत को सच्चे अर्थों में दुनिया का सिरमौर बनाने का मार्ग प्रशस्त करेंगे।

मगर इस बात पर खेद और क्षोभ होता है वर्षों से हमारे अधिकतर खबरिया चैनल इसका उलट कर रहे हैं। अपवादों को छोड़ दें तो वर्षों से किसी भी खबरिया चैनल ने कोई ऐसा कार्यक्रम नहीं किया, जिसमें दिन भर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, खान अब्दुल गफ्फार खान, सर सीवी रमन, गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, मदर टेरेसा, सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या, डॉ जगदीश चंद्र बसु, मुंशी प्रेमचंद, ग़ालिब आदि शख्सियतों पर चर्चा हुई हो, जिनकी शेरो-शायरी का इस्तेमाल हमारे नेता संसद में बहस के दौरान अक्सर किया करते हैं। ऐसे चैनल आजाद, बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान और भगतसिंह जैसे शहीदों के विचारों को लेकर भी कभी कोई परिचर्चा आयोजित नहीं करते।

सवाल उठता है कि आखिर ये दिन भर करते क्या हैं! ये भारत के नागरिकों को या तो फिल्मी कलाकारों के रोमांस से जुड़े किस्से परोसते हैं या फिर आसाराम, राम रहीम, रामपाल और नित्यानंद जैसे लोगों के किस्से सुनाते हैं। नतीजतन, हमारे युवा बाबाओं के बारे में जानते हैं, विक्रम साराभाई के बारे में नहीं। इनके पास जब कुछ मसाला नहीं होता है तो ये अपने चैनलों पर कुछ पाकिस्तानियों को बुला कर भारत को गालियां दिलवाते हैं।

ये अपनी परिचर्चा में जिन लोगों को बुलाते हैं, उनमें से अधिकतर ‘हिंदू-मुसलमान’ से परे कुछ नहीं जानते हैं। क्या देश में ऐसे लोगों का अकाल पड़ गया है जो राष्ट्रीय महत्त्व के विषयों पर गंभीर चर्चा कर देश के नौजवानों का ज्ञानवर्धन कर सकें। सवाल इनकी नीयत का है, अन्यथा ऐसे विवेकशील लोग तो महानगरों, नगरों, कस्बों और देहातों में सभी जगह मिल जाएंगे।

’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली

Next Stories
1 चौपाल: रेलवे का निजीकरण, प्लास्टिक का जहर व वशिष्ठ नारायण अमर रहें!
2 चौपाल: महंगी परीक्षा व सांसदों का फर्ज
3 चौपाल: बेरोजगारों के विरुद्ध व विदेश का झांसा
ये पढ़ा क्या?
X