ताज़ा खबर
 

चौपाल: मतदाता का दायित्व व प्रचार की दीवारें

आम चुनाव एक ऐसा अवसर होता है जिसमें सत्तारूढ़ दल अपने कामों, उपलब्धियों और भावी योजनाओं को जनता के समक्ष रख कर एक और जनादेश मांगता है।

Author Published on: February 8, 2020 1:28 AM
यों चुनाव प्रक्रिया का कार्यभार चुनाव आयोग को सौंपा जाता है, ताकि निष्पक्ष रूप से चुनाव हो सके।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जिसमें समय-समय पर चुनाव प्रक्रिया होती रहती है, जो देश के हरेक नागरिक को यह अधिकार देती है कि वे गुप्त मतदान द्वारा बिना किसी डर के किसी भी पार्टी के व्यक्ति को देश या राज्य सरकार बनाने के लिए अपना प्रतिनिधि चुन सकते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या चुनाव प्रक्रिया सही मायने में इतनी सशक्त है कि देश का नागरिक निर्भय होकर अपना मतदान कर सकें? आज भी कई जगहों पर लोगों को डरा धमका कर भी वोट डलवाए जाते हैं। दूसरी ओर चुनाव प्रक्रिया के समय लोगों को कई तरह के लालच भी दिए जाते हैं, जिससे कुछ लोग स्वार्थ पूर्ति के लिए बिना सोचे समझे ही मतदान कर देते हैं। यह देश और समाज दोनों के लिए हानिकारक सिद्ध होता है।

यों चुनाव प्रक्रिया का कार्यभार चुनाव आयोग को सौंपा जाता है, ताकि निष्पक्ष रूप से चुनाव हो सके। चुनाव से कुछ समय पहले से अचार संहिता लगा दी जाती है, जिसके अंतर्गत प्रत्याशी द्वारा किसी भी तरह का भड़काऊ भाषण देने या धर्म, जाति के नाम पर खेलने और मतदाताओं को किसी भी तरह का प्रलोभन देने पर प्रतिबंध है। सरकारी मशीनरी, अत्यधिक नगदी को लेकर चलना और मतदाताओं पर किसी तरह का दबाव बनाना भी प्रतिबंधित है। अगर चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित इन सभी निर्देंशों के मद्देनजर चुनाव प्रक्रिया पूरी की जाए तो शायद चुनाव के बाद देश की जनता को निराशा का सामना न करना पड़े।
चुनावी प्रतिक्रिया को कामयाब बनाने का उत्तरदायित्व जितना चुनाव आयोग का है, उतना ही दायित्व चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों और देश के नागरिकों का है। देश के सभी नागरिकों को अपने इस अधिकार का संपूर्ण जागरूकता, विवेक और निर्भयता के साथ इस्तेमाल करना चाहिए।

’केशी गुप्ता, द्वारका, दिल्ली

प्रचार की दीवारें

जब चुनाव नजदीक आता है तो राष्ट्रवाद के नाम पर कुछ समूह जनता को बरगलाने और गुमराह करके ध्रुवीकरण की राजनीति करने का जो प्रयास किया जाता है, वह आम जनमानस के लिए बेहद शोचनीय स्थिति है। आम चुनाव एक ऐसा अवसर होता है जिसमें सत्तारूढ़ दल अपने कामों, उपलब्धियों और भावी योजनाओं को जनता के समक्ष रख कर एक और जनादेश मांगता है। लेकिन वर्तमान में सब अलग है। जब देश के कई बड़े नेता अपने प्रचार को बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक या फिर हिंदू-मुसलिम ध्रुवीकरण में ले जाते हुए दिख रहे हैं तो एक तरह से इसे संसदीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत के तौर पर देखा जा सकता है।

अब तक विकास और रोजगार की बातें बेबुनियाद साबित हुई हैं, रोज अखबारों के पन्ने दुष्कर्मों से भरे रहते हैं, कानून व्यवस्था बिल्कुल जर्जर, किसानों की आत्महत्या, ध्वस्त शिक्षा-व्यवस्था बड़ी समस्या के रूप में सामने है। जनता को इन असल सवालों से ध्यान भटका कर वोट बैंक की राजनीति की जा रही है। एक खास समुदाय के वोट बैंक पर सवाल उठाने वाले राजनीतिक दल दूसरे समुदाय को वोट बैंक में तब्दील कर रहे हैं। ऐसे में कैसे सबका साथ सबका विकास होगा?

’अभिनंदन भाई पटेल, लखनऊ

Next Stories
1 चौपाल: सही तथ्य
2 चौपालः विरासत की अनदेखी
3 चौपालः बजट का खेल
ये पढ़ा क्या?
X