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चौपाल: अनुत्तरित प्रश्न

आखिरकार कर्नाटक में पिछले बीस दिनों से चल रही राजनीतिक उठापठक का एक और नाटकीय अध्याय मंगलवार को संपन्न हुआ। मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी की अगुवाई वाला कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सदन में विश्वास मत हासिल करने में विफल रहा।

कर्नाटक विधानसभा में मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी और उपमुख्यमंत्री जी परमेश्वर ( फोटो सोर्स: PTI)

 

आखिरकार कर्नाटक में पिछले बीस दिनों से चल रही राजनीतिक उठापठक का एक और नाटकीय अध्याय मंगलवार को संपन्न हुआ। मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी की अगुवाई वाला कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सदन में विश्वास मत हासिल करने में विफल रहा। निवर्तमान सरकार के पक्ष में 99 और विपक्ष में 105 मत पड़े। इसी के साथ कांग्रेस के हाथ से एक और राज्य छिटक गया। हाल ही में संपन्न हुए आम चुनावों में करारी शिकस्त के बाद से ही संगठनात्मक ढांचे में तालमेल और राष्ट्रीय नेतृत्व के अभाव से जूझ रही कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम किसी गंभीर आघात से कम नहीं है। साफ तौर पर कहें तो भारत की सबसे पुरानी पार्टी फिलहाल ‘रसातल’ में चली गई है, जहां से उसे ‘धरातल’ पर आने का रास्ता मालूम नहीं है। दूसरी ओर भाजपा के नजरिये से यह विश्वास मत देर आए दुरुस्त आए कहावत के चरितार्थ होने जैसा है। गौरतलब है कि राज्य के 2018 विधानसभा चुनावों में भाजपा ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों में खंडित जनादेश के अंतर्गत उपजे गठबंधन के चलते भाजपा राज्य में सरकार बनाने से चूक गई थी।

खैर, कर्नाटक में जो हुआ उससे लोकतांत्रिक मूल्यों का व्यापक स्तर पर नैतिक पतन जरूर हुआ है जिसके चलते हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली पर प्रश्नचिह्न जरूर लगा है। इस पूरे घटनाक्रम में दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव, खरीद-फरोख्त जैसे नकारात्मक राजनीतिक पहलू अब अलग श्रेणी के ही शब्द नजर आते हैं। यह पहली दफा नहीं है जब विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक राष्ट्र में राजनीतिक मूल्यों का पतन हुआ हो। इससे संदेह होता है कि कहीं हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली इतनी सुभेद्य तो नहीं कि उसमें सवाल तो हमें पता हैं लेकिन जवाब नहीं…!
’केशव शर्मा, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

उलटा दांव
अमेरिका द्वारा पाकिस्तान से द्विपक्षीय वार्ता व कश्मीर के संबंध में मनमाना बयान एक सोची-समझी साजिश लगती है। ट्रंप आगामी चुनाव को देखते हुए यह दांव खेल कर अपने प्रतिद्वंद्वियों पर भारी पड़ने की कोशिश कर रहे हैं। भारत द्वारा रूस से एस- 400 मिसाइल सुरक्षा प्रणाली का सौदा समाप्त न करना भी अमेरिका को चुभ रहा था जिसे लेकर उसने विदेश मंत्रालय को कई बार चेताया पर भारत सरकार के कठोर निर्णय के कारण उसकी दाल नहीं गली। भारत को सुरक्षित व संपन्न बनाने के लिए केंद्र सरकार ने अमेरिका की धमकियों की भी कोई चिंता नहीं की। यही कारण है कि कश्मीर मामले में एक नया राग अलाप कर अमेरिका पाकिस्तान के बहाने भारत पर तीर तान रहा है पर अब यह पैंतरा काम नहीं आएगा।

भारत पर अब उसकी गीदड़ भभकियों का कोई असर नहीं होगा। भारत सरकार ने तुरंत इस बयान के विरोध में संदेश भेजा कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है लिहाजा, इसमें कोई अन्य देश कोई हस्तक्षेप न करे। ऐसे बयान ट्रंप और अमेरिका की विश्वसनीयता के लिए गंभीर खतरा हैं। भारत के कड़े रुख व अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण ही अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने व्हाइट हाउस के माध्यम से बताया कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच का द्विपक्षीय मामला है और इसमें किसी तरह के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं। भारत के वैश्विक जनाधार के कारण ट्रंप का दांव उल्टा पड़ गया।
’मंगलेश सोनी, मनावर, धार, मध्यप्रदेश

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