ताज़ा खबर
 

चौपाल: सही तथ्य

आपदा के क्षेत्रों में प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा दिया गया है।

आजादी के बाद की सरकारें जनता की बुनियादी समस्याओं के प्रति संवेदनशील नहीं रहीं

जनसत्ता के 11 जनवरी, 2020 के अंक में ‘फसल बीमा योजना पर उठते सवाल’ लेख (लेखक- अभिजीत मोहन) प्रकाशित हुआ था। इस लेख में कुछ तथ्यों को सही तरीके से नहीं रखा गया है। जैसे, साल 2016-17 में बीमा कंपनियों ने किसानों को सिर्फ 10,500 करोड़ रुपए मुआवजे के तौर पर दिए जबकि केंद्र और राज्य सरकारों ने बीमा कंपनियों को एक लाख इकतीस हजार अठारह करोड़ प्रीमियम के रूप में दिए- यह तथ्य सही नहीं है। सही तथ्य यह है कि 2016-17 में कुल प्रीमियम 21,875 करोड़ के विरुद्ध 16,768 करोड़ रुपए का भुगतान मुआवजे के दावों के रूप में किसानों को किया गया।

गत तीन वर्षों के दौरान (2016-2019) प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों की संख्या में कमी आई है, भी सही तथ्य नहीं है। सही तथ्य यह है कि 2015-16 में किसानों का नामांकन 4.86 करोड़ से बढ़ कर 2016-17 में 5.84 करोड़ हुआ, और 2017-18 में 5.28 करोड़ से बढ़ कर 2018-19 में 5.68 करोड़ हुआ। इसके अलावा, गैर-ऋणी किसानों का नामांकन जिनके लिए योजना स्वैच्छिक है, 2015-16 में योजना के तहत कुल कवरेज के 5.7 प्रतिशत से बढ़ कर खरीफ 2019 तक 38.3 प्रतिशत हुआ है।

इसी तरह, सरकारी और निजी बीमा कंपनियों के मुनाफा बढ़ने की बात सही नहीं है। बीमा राशि का भुगतान राज्य सरकारों द्वारा दिए गए फसल कटाई के आंकड़ों की गणना के अनुसार होता है। यदि किसी वर्ष में फसल अच्छी हुई है तो भुगतान राशि में कमी होगी और यदि नुकसान अधिक होगा तो बीमा राशि भी ज्यादा होगी अत: बीमा कंपनी की देय राशि भुगतान के सापेक्ष कम या ज्यादा होगी। बीमाकर्ता अच्छे सत्रों/वर्षों में प्रीमियम की बचत करते हैं और यदि किसी वर्ष ज्यादा दावे आते हैं तो अच्छे वर्षों में की गई बचत में से उच्च दावों का भुगतान किया जाता है।

भुगतान किए गए प्रीमियम और दावों के बीच का अंतर बीमा कंपनियों के लिए मार्जिन/लाभ नहीं है। कुल प्रीमियम का 10 प्रतिशत से 12 प्रतिशत तक पुनर्बीमा और प्रशासनिक लागत का खर्च भी बीमा कंपनियों को वहन करना पड़ता है।

आपदा के क्षेत्रों में प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा दिया गया है। जैसे कि 2016-17 में तमिलनाडु में 292 प्रतिशत, कर्नाटक में 141 प्रतिशत, मध्यप्रदेश में 134 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 110 प्रतिशत का दावा अनुपात था। इसी तरह 2017-18 में छत्तीसगढ़ का दावा अनुपात 383 प्रतिशत, ओडिशा का 217 प्रतिशत, हरियाणा का 198 प्रतिशत और तमिलनाडु का 140 प्रतिशत था। खरीफ 2018 में, हरियाणा और छत्तीसगढ़ का दावा अनुपात क्रमश- 109 प्रतिशत और 105 प्रतिशत था। खरीफ 2019 में दावा राशि ज्यादा होने की संभावना है क्योंकि इस वर्ष पाया गया है कि बेमौसम वर्षा के कारण फसल का नुकसान ज्यादा हुआ है।

’डॉ आशीष कुमार भूटानी
मुख्य कार्यकारी अधिकारी (पीएमएफबीवाय) तथा संयुक्त सचिव, कृषि एवं
किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार,
कृषि भवन, नई दिल्ली।

Next Stories
1 चौपालः विरासत की अनदेखी
2 चौपालः बजट का खेल
3 चौपाल: विमर्श की जरूरत व जैव संपदा
ये पढ़ा क्या?
X