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चौपालः ठोस पहल की जरूरत

हमारी व्यवस्था में बहुसंख्यक गरीबों की तुलना में संपन्न लोगों को ही तरजीह दी जाती है। गरीब मजदूरों का नाम लेकर बड़े लोग अच्छे-अच्छे भाषण जरूर देते हैं, मगर असलियत में इनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता।

Author Published on: April 3, 2020 12:39 AM
चौपालः शिक्षा की चुनौतियां।

भारत में बंदी के बाद से बड़ी संख्या में आंतरिक प्रवासी, जो दिल्ली, मुंबई, हरियाणा, गुजरात जैसे राज्यों में कारखाना कर्मचारी, सफाई कर्मचारी, दैनिक मजदूर आदि के रूप में कार्यरत थे, उन्होंने अपने घर लौटने का फैसला कर लिया। बहुसंख्यक लोग पैदल ही अपने गंतव्य पर निकल चुके थे। यह पलायन विवाद का विषय बन गया, जब उत्तर प्रदेश की सीमा पर बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हो गए। फिर उत्तर प्रदेश सरकार और दिल्ली सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए। पर देखा जाए तो गलती उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से हुई थी, क्योंकि उसने फंसे हुए लोगों को निकालने के लिए कुछ बसें आनंद विहार से चलाई थी। यह खबर सब जगह फैल गई, और पलायन और तीव्र हो गया। दिल्ली सरकार ने भी हरियाणा और पंजाब से आ रहे लोगों को आनंद विहार तक पहुंचने से रोकने के लिए कठोर कदम नहीं उठाए, जैसा कि इस संकट की घड़ी में अपेक्षित था। हालांकि दिल्ली सरकार ने प्रवासियों के लिए भोजन और रहने का समुचित इंतजाम किया था, लेकिन इन प्रवासियों को समझाने और रोकने में उसे सफलता नहीं मिली। पर यह भी प्रश्न है कि जब दिल्ली पुलिस राज्य सरकार के अधीन नहीं आती, तो वह प्रवासियों को रोकने के लिए कदम कैसे उठा सकती थी। समग्रता से देखें तो इस मामले में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी दिखी।

निश्चित तौर पर प्रारंभिक चरण में जिन क्षेत्रों में ये प्रवासी गए होंगे, वहां कोरोना के प्रसार की संभावना है। प्रारंभिक चरण में किसी भी राज्य सरकार द्वारा इन प्रवासियों की प्रारंभिक जांच नहीं कराई गई। भारत में आंतरिक प्रवासियों की संख्या करोड़ों में है, जिन्हें चिह्नित कर पृथक करना किसी भी राज्य सरकार के लिए मुश्किल है। ऐसे में समस्त नागरिकों का कर्तव्य बनता है कि अगर उनके गांव, कस्बे या नगर में कोई भी व्यक्ति अन्य प्रदेश से आया है, जिसने अपने आप को पृथक नहीं किया है, उसकी सूचना तुरंत स्थानीय प्रशासन को उपलब्ध कराई जाए, जिससे समाज में इस संक्रमण के प्रसार को रोका जा सके और हम स्वयं अपने और अपने परिवार को सुरक्षित रख सकें।

हमारी व्यवस्था में बहुसंख्यक गरीबों की तुलना में संपन्न लोगों को ही तरजीह दी जाती है। गरीब मजदूरों का नाम लेकर बड़े लोग अच्छे-अच्छे भाषण जरूर देते हैं, मगर असलियत में इनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता। वरना सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर बरेली पहुंचे गुरबत के मारों को सड़क पर बैठा कर उन पर कीटनाशकों का छिड़काव कौन करता है। यह अमानवीय कृत्य उप्र प्रशासन ने किया। पूरे विश्व ने इसे देखा। पूरे विश्व से भारतीयों को हवाई जहाजों में भर कर भारत लाया गया। क्या उनके शरीर पर इस तरह का छिड़काव किया गया? नहीं। क्योंकि विदेशों में रहने वाले सुविधा संपन्न लोग हैं। पैदल यात्रा करने वाले शोषित वर्ग के हैं। इनका चाहे जितना शोषण होगा, कोई उफ तक नहीं करेगा। मीडिया भी कुछ नहीं बोलेगा। यह निहायत अमानवीय काम था।
-जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

असुरक्षा का दायरा
जिन मकान मालिकों ने डॉक्टरों को घर से निकालने की धमकी दी थी, उन पर दिल्ली प्रशासन ने कार्रवाई करने की चेतावनी जारी की थी। ऐसी चेतावनी उन मिल मालिकों को भी दी जाती, जिन्होंने मजदूरों को काम से निकाल दिया और वे बेघर होकर अपने गांव जाने को मजबूर हो गए। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि बंदी के दौरान कोई भी मिल मालिक अपने मजदूरों को न निकाले और उन्हें पूरा वेतन दे। अगर यह सावधानी रखी जाती तो बड़ी संख्या में मजदूरों के पलायन को रोका जा सकता था और कोरोना संक्रमण का भय भी नहीं होता।
-नवीन थिरानी, नोहर

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