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चौपाल: अमीरों का मंच

भारत में एक बड़े कारपोरेट की रोजाना की कमाई करोड़ों-अरबों में होती है।

Author Published on: January 27, 2020 2:00 AM
स्विस राष्ट्रपति को कहना पड़ा है कि ‘हमें साझा भविष्य के लिए सही संतुलन ढूंढ़ना है।

पूंजीवाद के लिए मजदूरों को केवल ‘जिंदा’ रखना जरूरी है, उनके अस्तित्व को बचाए रखना जरूरी है। यह भी ध्यान देना जरूरी है कि वे केवल ‘साक्षर’ बन कर ही अपना संपूर्ण जीवन बिता दें, गलती से भी वे ‘शिक्षित’ और ‘समझदार’ न बन जाएं। इसके अतिरिक्त एक बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि पर्याप्त रोजगार के बावजूद दस फीसद बेरोजगारी को बनाए रखना पूंजीवादी खेमे और फैक्ट्री मालिकों के लिए एकदम अत्यावश्यक है, क्योंकि इन दस फीसद बेरोजगार युवकों की लाइन हमेशा फैक्ट्री के गेट पर काम की तलाश के लिए लगी रहेगी, तभी भीतर काम करने वाले मजदूरों पर दबाव बना रहेगा और वे नौकरी जाने और बेरोजगार होने के खौफ और मानसिक दबाव में काम करते रहेंगे। दुनियाभर में,शोषण का यही सिलसिला सदियों से अनवरत चलता आ रहा है और भविष्य में भी यह पता नहीं, यह कब तक चलता रहे।

आज विश्व आर्थिक मंच नामक बड़े पूंजीवादी प्लेटफार्म के तहत, जिसमें आम जन की कोई सहभागिता ही नहीं है, बल्कि उसमें डोनाल्ड ट्रंप, अंबानी, अडानी से लेकर दुनिया के बड़े से बड़े, यूरोप से लेकर अमेरिका तक के बड़े-बड़े उद्योगपतियों, घोर पूंजीवादी परस्त संभ्रांत पत्रकारों, हॉलीवुड-बॉलीवुड के कलाकारों, बैंकरों आदि की सहभागिता वाली इस जमात से आम आदमी की भलाई की उम्मीद कैसे पाल सकते हैं?

इन बड़े-बड़े लोगों से सुशोभित इस विश्व आर्थिक मंच का निचोड़ ये है कि दुनिया भर में सरकारें अपनी हर तरह की ‘दखलांदाजी’ कम करें, मतलब वे जनकल्याण, मजदूरों के हितों के लिए, उनके अनवरत शोषण के खिल़ाफ चुप रहे, बल्कि सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में बेच दिया जाए, उन प्राइवेट कंपनियों पर टैक्स न लगाया जाए आदि-आदि। यह फोरम चूंकि बड़े कारपोरेटों का हितैषी मंच है और उस पर यह आरोप न लगे, इसलिए इस मंच से जलवायु परिवर्तन, भूख, बेरोजगारी जैसे मुद्दे भी उठा लिए जाते हैं। उदाहरण के लिए, इस फोरम में अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा अकारण ही एक संप्रभु राष्ट्र के सेनाध्यक्ष की नृशंस हत्या के कारण को वहां बैठे अमेरिकी साम्राज्यवाद के नुमाइंदे डोनाल्ड ट्रंप से कभी भी कोई नहीं पूछेगा कि ‘हे महानुभाव! आपने ऐसा कुकृत्य क्यों किया?’ अपितु वहां यह जरूर पूछा जा सकता है कि इस बिषम परिस्थिति में हम बड़े कारपोरेट उस क्षेत्र में निवेश कैसे कर पाएंगे?

भारत में एक बड़े कारपोरेट की रोजाना की कमाई करोड़ों-अरबों में होती है। दूसरी तरफ भारत सरकार की ही अधिकृत संस्था- नीति आयोग के अनुसार एक शहरी मजदूर की रोजाना की औसत कमाई सिर्फ 28 रुपए 65 पैसे है। इतनी भारी असमानता के चलते ही एक ऐसी स्थिति आती है जब 99.99 प्रतिशत आम जनता इतनी निर्धन हो जाती है कि उसकी खरीदने की क्षमता शून्य हो जाती है। ऐसी स्थिति बनने पर आर्थिक मंदी छा जाती है। हाल के वर्षों में भारत सहित विश्व के कई देशों की यही हालात हुई है, इसीलिए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में स्विस राष्ट्रपति को कहना पड़ा है कि ‘हमें साझा भविष्य के लिए सही संतुलन ढूंढ़ना है।

’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

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