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चौपाल: परीक्षा की समीक्षा

परीक्षा प्रणाली को बदलिए, परीक्षा के मूल्यांकन के तरीके को बदलिए। ऐसी शिक्षा-परीक्षा प्रणाली लाइए कि बच्चे तनाव और निराशा की जगह खुद को उत्साहित महसूस करें, बच्चे और माता-पिता मुस्कुराएं, डरे नहीं और अच्छा करने के संकल्प के साथ जिंदगी में आगे बढ़ें।

Author May 17, 2019 1:15 AM
मूल्यांकन का तरीका भी बदल गया है।

पिछले दिनों दसवीं और बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम घोषित हुए। इसमें 500 में से 499 तक अंक लाकर छात्र-छात्राओं ने टॉप किया। आखिर क्या कहते हैं ये परीक्षा परिणाम? कैसी मूल्यांकन व्यवस्था है यह जिसमें 90 प्रतिशत अंक लाने वाला छात्र, जिसने दिन-रात मेहनत की हो, वह भी तनाव और निराशा महसूस कर रहा हो? क्या 500 में से 499 अंक लाना बाकी छात्र-छात्राओं को निराशा से नहीं भर रहा है?

एक समय था जब 33 प्रतिशत अंकों के साथ ‘थर्ड डिवीजन’ से पास होने वाले छात्र भी उत्साहित होकर बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने के लिए बड़े ही अनोखे अंदाज में उनसे कहते थे कि ‘आशीर्वाद दो, मैं पास हो गया।’ 50 से 55 प्रतिशत अंक पाने वाले छात्र गर्व से कहते थे कि वे ‘गुड सेकंड’ से पास हुए हैं और कोई बहुत होशियार ही 60 प्रतिशत अंक लाकर ‘फर्स्ट’ आता था तो पूरे मोहल्ले के लोग और रिश्तेदार उसके घर आकर बधाई दिया करते थे। और तो और, 75 प्रतिशत लाने वाले की ‘डिस्टिंक्शन’ आती थी और उसका चयन आईएएस/आईपीएस में निश्चित कहा जाता था।

समय के साथ-साथ मूल्यांकन का तरीका भी बदला है जो समय के अनुसार सही भी है लेकिन पहले के मूल्यांकन और आज के मूल्यांकन में जमीन-आसमान का अंतर है। पहले कॉपी जांचने वाला बच्चे के दिमाग को टटोलने की कोशिश करता था, पर आज की कॉपियां यह देख कर जांची जाती हैं कि किसने किताबी भाषा को हूबहू कॉपी पर उतारा है।

माता-पिता भी कहीं न कहीं ऐसी व्यवस्था के लिए जिम्मेदार होते हैं क्योंकि वे भी अंकों पर ज्यादा जोर देकर बच्चे पर दबाव बनाते हैं। इस वजह से बच्चे भी रट्टू तोता बन कर उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश में लगे हुए हैं। ऐसे में क्या बीतती होगी उस छात्र पर जो 90 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया? क्या किसी ने उनकी मानसिकता का जायजा लिया जो 70 और 80 प्रतिशत अंक लाकर भी खुद को बेकार समझ बैठे हैं और मेहनत करने के बाद भी तनाव और निराशा से घिरे हुए हैं। हमारे देश की परीक्षा प्रणाली किसी अवसाद के कारखाने से कम नहीं है।

परीक्षा प्रणाली को बदलिए, परीक्षा के मूल्यांकन के तरीके को बदलिए। ऐसी शिक्षा-परीक्षा प्रणाली लाइए कि बच्चे तनाव और निराशा की जगह खुद को उत्साहित महसूस करें, बच्चे और माता-पिता मुस्कुराएं, डरे नहीं और अच्छा करने के संकल्प के साथ जिंदगी में आगे बढ़ें। तत्काल बदलिए देश की परीक्षा प्रणाली क्योंकि ऐसे मूल्यांकन के दूरगामी परिणाम देश के भाविष्य के लिए सही नहीं हैं।
’अभिषेक भारद्वाज, ज्वालापुर, हरिद्वार, उत्तराखंड

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