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चौपाल: विषमता के विरुद्ध

आज पूंजीवादी व्यवस्था कुछ ऐसा रूप ले चुकी है कि साधन संपन्न लोग और अधिक अमीर होते जा रहे हैं और गरीब और अधिक गरीब।

Author November 9, 2018 4:16 AM
प्रतीकात्मक फोटो

ऑक्सफैम की रिपोर्ट साफ-साफ दर्शाती है कि हमारे यहां आर्थिक असमानता आज चरम पर है और ज्यादातर विकासशील देश इस समस्या से ग्रस्त हैं। दरअसल, आज पूंजीवादी व्यवस्था कुछ ऐसा रूप ले चुकी है कि साधन संपन्न लोग और अधिक अमीर होते जा रहे हैं और गरीब और अधिक गरीब। इस व्यवस्था में पहले वस्तुएं उत्पादित की जाती हैं और फिर लोगों के भीतर उनकी जरूरतें पैदा की जाती हैं। इन्हीं वस्तुओं की लालसाएं आज हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं। अमीर लोग इसी का फायदा उठा कर वह पूंजी भी सोख लेते हैं जो थोड़ी-बहुत मात्रा में निम्न और मध्य वर्गके पास होती है। इन पूंजीवादी कौरवों ने ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है कि आम मनुष्य उसमें फंसे बगैर नहीं रह सकता है। प्राचीन काल में भारत को सोने की चिड़िया इसलिए कहा जाता था कि यहां सभी लोग संपन्न थे।

उस समय साझा अर्थव्यवस्था होती थी और सभी को फलने-फूलने के उचित अवसर मिलते थे। मौर्य काल में तो सम्राट अशोक ने कर की अधिकतम दर दस प्रतिशत रखी हुई थी। अलाउद्दीन खिलजी ने भी बाजार नियंत्रण बहुत सख्त किया था ताकि कोई भी सामान उसके निर्धारित मूल्य से अधिक पर न बेचा जाए। लेकिन औपनिवेशिक काल में इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्रांति का भारत पर सीधा असर पड़ा और हमारे वे सभी उद्योग धंधे एक-एक करके बंद होते चले गए जो निम्न और मध्य वर्ग में आय का एकसमान वितरण करने में अत्यंत सहायक होते थे। आजादी के तुरंत बाद गांधीजी ने शायद इसी को ध्यान में रखते हुए लघु एवं कुटीर उद्योगों पर बल देने को कहा था लेकिन इसके उलट नेहरूजी ने भारी उद्योगों को बढ़ावा दिया। इससे देश की अर्थव्यवस्था में तो निश्चित रूप से वृद्धि हुई लेकिन इस उत्पादित पूंजी का समान वितरण करने में हमारी सरकारों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली और इससे गरीब तबका हाशिये पर चला गया। आज भले ही भारत विश्व की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका हो लेकिन यह भी कटु सत्य है कि संख्या के हिसाब से सर्वाधिक गरीब लोग भी भारत में ही बसते हैं। इसके मद्देनजर सरकार को जल्दी ही आर्थिक असमानता दूर करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
’सचिन पंवार, ग्रेटर नोएडा

बेकाबू प्रदूषण
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में प्रदूषण की गंभीर हालत को देखते हुए पटाखों की बिक्री पर रोक लगाने के साथ ही दिवाली पर केवल ग्रीन पटाखे जलाने की अनुमति दी थी। साथ ही पटाखे जलाने के लिए रात आठ से दस बजे का समय निश्चित किया था। लेकिन पटाखा व्यापारियों को यह घाटे का सौदा लगा क्योंकि कोर्ट का यह निर्देश दिवाली के चंद दिन पहले ही तब आया था जब तक वे बिक्री के लिए पटाखों का स्टॉक खरीद चुके थे। साथ ही लोगों को भी नहीं पता था कि ग्रीन पटाखें क्या होते हैं, कहां मिलते हैं? न ऐसी कोई भी जानकारी सरकार ने जनता को दी। इसका फायदा व्यापारियों ने खूब उठाया और पहले से लाए गए पटाखों को घर में छिपा कर, मिठाइयों के डिब्बों में पैक करके दुगने दामों में बेचा गया। इस तरह की खबरें भी रोजाना आ रही थीं लेकिन प्रशासन मूकदर्शक बना रहा और लोगों ने चोरी-छिपे दुगने दामों पर पटाखे खरीदे। कोर्ट के आदेश के बाद भी दिवाली पर जम कर पटाखे फोड़े गए। न तो लोगों में पुलिस का डर दिखा न ही पर्यावरण की चिंता नजर आ रही थी। सब अपने में ही मस्त थे। पटाखों के धुएं से होने वाले नुकसान से भी किसी को कोई लेना-देना नहीं था।

इसके मद्देनजर एक सवाल दिल्ली वालों को खुद से भी करना चाहिए कि क्या प्रदूषण के लिए केवल सरकार जिम्मेदार है? क्यों हमने अपना कर्तव्य नहीं निभाया? क्यों आज पटाखों के धुएं की वजह से दिल्ली वाले ठीक से सांस नहीं ले पा रहे? किसी ने सही ही कहा है, जैसी करनी वैसी भरनी! अफसोसनाक है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना होती आ रही है। पिछले साल भी दिवाली के समय पर्यावरण के हित में इसी तरह के निर्देश आए थे लेकिन पहले की तरह ही इस बार भी लोगों ने कोर्ट के आदेश का मजाक बनाया था। यह साफ तौर पर बताता है कि लोगों में अब सुप्रीम कोर्ट का भी डर नहीं है।
’प्रिया गोस्वामी, आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली

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