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चौपाल: किसकी जिम्मेदारी

दिवाली से संबंधित दो खबरों पर ध्यान गया। एक में कुछ बच्चे अपने मुंह पर मास्क लगा कर पटाखा जला रहे थे और उसके पीछे कोई खड़ा था। दूसरी में सिंगापुर में भारतीय मूल के दो लोगों को इसलिए गिरफ्तार किया गया कि वे दिवाली की पूर्व संध्या पर सरकारी आदेश के खिलाफ पटाखे जला रहे थे।

Author November 10, 2018 3:44 AM
कहने को दिल्ली जैसे महानगर में पढ़े-लिखे और प्रबुद्ध लोग रहते हैं, लेकिन उन्हीं में से ऐसे लोग भी हैं जो दिवाली पर अपने बच्चों को ढेर सारे पटाखे लाकर देना शान की बात समझते हैं।

दिवाली से संबंधित दो खबरों पर ध्यान गया। एक में कुछ बच्चे अपने मुंह पर मास्क लगा कर पटाखा जला रहे थे और उसके पीछे कोई खड़ा था। दूसरी में सिंगापुर में भारतीय मूल के दो लोगों को इसलिए गिरफ्तार किया गया कि वे दिवाली की पूर्व संध्या पर सरकारी आदेश के खिलाफ पटाखे जला रहे थे। सर्वोच्च न्यायालय के कहने और डॉक्टरों या विशेषज्ञों की सलाह के बावजूद महानगरों से गांवों तक मेंं दिवाली पर इतने पटाखे जलाए गए हैं कि आने वाले कई दिनों तक खुली हवा में बाहर निकलना खतरनाक रहेगा। हम भारतीय लोग इतने लापरवाह और गैरजिम्मेदार होते हैं कि जिस चीज से जीवन को खतरा है उसे भी गंभीरता से नहीं लेते। कहने को दिल्ली जैसे महानगर में पढ़े-लिखे और प्रबुद्ध लोग रहते हैं, लेकिन उन्हीं में से ऐसे लोग भी हैं जो दिवाली पर अपने बच्चों को ढेर सारे पटाखे लाकर देना शान की बात समझते हैं। जबकि उन पटाखों से उनके जान को भी उतना ही खतरा है, जितना दूसरों को। जब तक जनता के अंदर किसी समस्या के प्रति संवेदनशीलता नहीं आएगी, तब तक सरकार या न्यायालय सब कुछ नहीं कर सकते।

लेकिन महानगरों में ऐसा लगता है कि लोगों की संवेदना मर-सी गई है। पिछले कुछ वर्षों से दिल्ली की हवा में प्रदूषण स्तर का जो हाल हो गया है और लोगों मेंं उसके प्रति जागरूकता का जो क्षरण हुआ है, उससे तो यही कहा जा सकता है कि लोगों और राजनीतिक दलों के बीच अदालतों के आदेश भी निरर्थक हो गए हैं। दिवाली की रात कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन प्रशासन की ओर से की गई कार्रवाई बहुत कम और अपर्याप्त है। इसके लिए ठोस और गंभीर कदम उठाने की आवश्यकता है। नहीं तो वह दिन आ गया है कि पहले पानी के कारण और अब हवा के कारण लोगों को अपनी जान बचाने के लिए दिल्ली छोड़ने पर मजबूर होना पड़ेगा।
’सुशील कुमार शर्मा, उत्तम नगर, नई दिल्ली

सरकार ही क्यों
लोकतंत्र का महापर्व चुनाव के तौर पर हमारे देश में हर पांच वर्षों में मनाया जाता है। इसी दौरान हमने राजनीति को करीब से देखा है, लेकिन विडंबना यह है कि हम अपने प्रतिनिधि से प्रश्न पूछने में संकोच करते हैं। कहीं सुना था कि राजनीति एक धर्म की तरह ही है। लेकिन जब हकीकत से रूबरू हुआ तो पाया कि हमारे देश में हर घड़ी धर्म की राजनीति हो रही है। क्या यह मान कर चला जाए कि देश की सियासत का कद इस देश से भी बड़ा हो गया है और कुर्सी इंसानियत से भी बड़ी। बीते हुए वक्त पर नजर डालते हैं तब पता चलता है कि किस प्रकार समाज के गलियारे में सत्ता के भूखे गीदड़ घूमते रहते हैं, जो चुनाव के वक्त लोगों के सामने नतमस्तक होकर आग्रह करते हैं और चुनाव होने के बाद वे लोगों को अपना सेवक बना देते हैं। जब जवाबदेही की बारी आती है तो हमारे प्रतिनिधि हमें जाति, मंदिर-मस्जिद और गाय-गोबर जैसे मुद्दों में उलझा कर या यों कहें कि हमें गुमराह कर ईवीएम के मसले से हमें भटक जाने पर मजबूर कर देते हैं।

आज भी हम उसी घिसी-पिटी शिक्षा प्रणाली पर चल रहे हैं जो गुलामी के दौर में अंग्रेजों द्वारा तैयार की गई थी। आज हम बहते-बहते इस किनारे पर आ गए हैं कि हमें शिक्षा के नाम पर ग्रेड और प्रतिशत तक सीमित रख दिया जाता है। इससे तैयार विचार में एक मध्यमार्ग अपनाने वाले व्यक्ति के लिए जगह नहीं छोड़ी गई है। अगर कोई प्रश्न पूछे तो वह गुनहगार, न पूछे तो चाटुकार। अगर झारखंड की बात की जाए तो यहां की हालत काफी बदतर है। सरकारी कॉलेजों की दयनीय स्थिति के अलावा शिक्षकों की भी हालत बेहद खराब है। डिग्री है, लेकिन पढ़ाने की शैली मालूम नहीं। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में सेमेस्टर की परिक्षाएं छह से आठ महीने की देरी से चलती हैं।

राजनीतिकों को समझना होगा कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी चीजें हर किसी को चाहिए। वे क्यों नहीं समझते कि हमें मंदिर नहीं, कॉलेज चाहिए… मस्जिद नहीं, डॉक्टर चाहिए। हमें बड़ी-बड़ी मूर्तियां नहीं, रोजगार चाहिए। वक्त आ चुका है जब हमें अपनी आवाज बुलंद करते हुए अपने नेतृत्व से सवाल पूछना चाहिए कि विकास की रफ्तार इतनी सुस्त क्यों है। सरकार तब क्या कर रही थी जब हमारे टैक्स का पैसा लेकर कुछ लोग देश से फरार हो गए?
सरकार बिजली नहीं देती है तो हम जेनरेटर लगवा लेते हैं। सरकारी स्कूल में पढ़ाई नहीं होती तो प्राइवेट में दाखिला ले लेते हैं। नल में पानी नहीं आता तो बोरिंग करवा लेते हैं। तब यह सोचने की बात है कि फिर हम सरकार क्यों चुनते हैं!
’हर्ष गंगवार, फर्रुखाबाद, उप्र

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