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चौपाल: अभावों के खिलाड़ी

यह विडंबना नहीं तो क्या है कि जब हमारे खिलाड़ी विदेशों से पदक जीत कर वापस आते हैं तो तमाम सरकारें करोड़ों रुपए इनाम देकर उनका मान-सम्मान करती हैं। लेकिन उभरते हुए खिलाड़ियों की कभी कोई सरकार सुध तक नहीं लेती।

Author September 8, 2018 2:06 AM
स्वप्ना बर्मन। (फोटो सोर्स- पीटीआई)

जकार्ता एशियाई खेलों में भारत 69 पदकों से साथ आठवें और चीन 289 पदकों के साथ पहले स्थान पर रहा। स्वर्ण पदक जीतने वाली पश्चिम बंगाल की खिलाड़ी स्वप्ना बर्मन का कहना है कि बचपन में वह धान के ऊबड़-खाबड़ खेतों में अभ्यास करती थी; दो बांसों के बीच रस्सी बांध कर उसने ऊंची कूद का अभ्यास शुरू किया था। ऐसी ही कहानी मुक्केबाजी में स्वर्ण पदक जीतने वाले रोहतक के अमित पंघाल की भी है। अमित के पास बचपन में दस्ताने तक नहीं थे। बिना दस्तानों के ही उसने मुक्केबाजी का अभ्यास शुरू किया था। गनीमत है कि ये लोग खुशकिस्मत थे कि इन्होंने हालात को बदल दिया। लेकिन बहुत-से गुमनाम खिलाड़ी ऐसे भी हैं जिनके हालात उनके हुनर पर हावी हो गए और वे हमेशा-हमेशा के लिए गुमनामी की दुनिया में खो गए। उनके सपने सच होने से पहले ही टूट कर बिखर गए।

यह विडंबना नहीं तो क्या है कि जब हमारे खिलाड़ी विदेशों से पदक जीत कर वापस आते हैं तो तमाम सरकारें करोड़ों रुपए इनाम देकर उनका मान-सम्मान करती हैं। लेकिन उभरते हुए खिलाड़ियों की कभी कोई सरकार सुध तक नहीं लेती। इत्तिफाक देखिए कि हरियाणा जैसा छोटा राज्य एशियाई खेलों में छाया रहा। क्या दूसरे राज्यों में खिलाड़ियों की कोई कमी है या हमने कभी उन्हें तलाश कर निखारने की कोशिश ही नहीं की? अगर हम शहरों को छोड़ कर गांव के उन इलाकों में जाते जहां के बच्चे दिनभर नहरों में नहाते हैं, खेतों में काम करते हैं और उन्हें उचित ट्रेनिंग देते तो क्या वे आज हमारे लिए पदक जीत कर नहीं ला सकते थे? इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर हमने भी चीन की तरह उभरते हुए खिलाड़ियों को सहेजा होता तो आज हम चीन की जगह पहले स्थान पर होते और खेलों में एशिया का बादशाह भारत होता। पर अफसोस, हमारी सरकारें सिर्फ पदकों से प्यार करती हैं, खिलाड़ियों से नहीं।

’रोहित यादव, एमडी यूनिवर्सिटी, रोहतक

यह विकल्प
पेट्रोल और डीजल के दाम जिस प्रकार लगातार आसमान छू रहे हैं उससे आम लोगों की जेबों पर खासा दबाव पड़ रहा है। अक्सर लोग अपने मासिक खर्च के हिसाब-किताब में पेट्रोल-डीजल को जगह नहीं देते थे लेकिन इनके लगातार आसमान छूते दामों और जेब पर पडते असर के चलते अब इस खर्च को भी ध्यान में रखकर मासिक बजट तय होता है। ऐसी स्थिति में सार्वजनिक परिवहन एक अच्छा विकल्प हो सकता है। इससे न सिर्फ जेब पर बोझ कम पड़ेगा बल्कि पर्यावरण पर भी प्रदूषण का दबाव कम होगा। अगर ज्यादातर लोग कार पूलिंग और सार्वजनिक परिवहन का सहारा लें तो सड़कों पर वाहनों की भीड़ से भी निजात मिल सकती है।
’सुयश पांडेय, नई दिल्ली

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