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चौपाल: प्लास्टिक पर पाबंदी

भारत में कई राज्यों में प्लास्टिक पर प्रतिबंध है, लेकिन इसके बावजूद यह बाजार में मिल रहा है। प्लास्टिक पर्यावरण के लिए बहुत ही घातक है, इसे नष्ट होने में कई सौ साल लग जाते हैं।

प्लास्टिक पर्यावरण को काफी नुकसाना पहुंचा रहा है।

इस बार प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से देश के नागरिकों को संबोधित करते हुए नए भारत के निर्माण में अपना योगदान देने की अपील की और इसके लिए पहला संदेश यह दिया कि प्लास्टिक की थैलियों का इस्तेमाल बंद किया जाए। दुकानदारों से भी कहा गया है कि वे अपनी दुकान पर लिख कर लगा दें कि ‘कृप्या अपना थैला साथ लाएं, यहां प्लास्टिक की थैली नहीं मिलती।’ इस तरह प्लास्टिक के इस्तेमाल को खत्म करने का अभियान शुरू हो जाएगा। भारत में कई राज्यों में प्लास्टिक पर प्रतिबंध है, लेकिन इसके बावजूद यह बाजार में मिल रहा है। प्लास्टिक पर्यावरण के लिए बहुत ही घातक है, इसे नष्ट होने में कई सौ साल लग जाते हैं। कई बार तो मवेशी इसे खा भी जाते हैं। गायों के पेट से प्लास्टिक की थैलियां निकलने की खबरें अक्सर आती रहती हैं।
लेकिन बुनियादी सवाल है तो यह है कि सरकार प्लास्टिक की थैलियां बनाने वाली इकाइयों को बंद क्यों नहीं करती। अगर इनका निर्माण करने वाली इकाइयां बंद हो जाएं और उन्हें वैकल्पिक रोजगार मुहैया कराया जाए तो प्लास्टिक की थैलियां बाजार में आनी ही बंद हो जाएंगी। हकीकत तो यह है कि जब तक प्लास्टिक की थैलियां बनाने वाली इकाइयों को बंद करने का फैसला नहीं किया जाएगा, तब तक इनके उपयोग पर रोक लगाना आसान काम नहीं है।
’राघव जैन, जालंधर

बिजली के वाहन
भारत सरकार की योजना है कि वर्ष 2030 तक सड़कों पर मौजूद वाहनों में तीस फीसद वाहन बिजली से चलने वाले हों। लेकिन इस तंत्र के बाद बिजली से चलने वाली कारें काफी महंगी हो जाएंगी और बढ़े दाम आम ग्राहक को आकर्षित नहीं कर पाएंगे। इसके लिए सरकार क्रेडिट प्वाइंट जैसी सुविधा या टोल टैक्स आदि में कुछ छूट जैसे प्रावधान कर सकती है। बीएस-6 मानक लागू होने से बिजली से चलने वाले वाहनों को प्रोत्साहित कर सकती है। यहां इ-वाहनों में लगी लिथियम आयन बैटरी की क्षमता पर भी विचार करना होगा, जिसमें बैटरी बार बार चार्ज होने पर इसकी क्षमता में कमी आने लगती है। अभी इ-वाहनों के लिए चार्जिंग स्टेशनों की संख्या बहुत कम है। ऐसे में यात्रा करने वालों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए विश्वसनीय बैटरी स्टेशन विकसित किए जाएं जो डिस्चार्ज बैटरी के बदले चार्ज की हुई बैटरी उपलब्ध करवा सकें।
’अजीत कुमार गौतम, गोरखपुर

कब लेंगे सबक
हम हर साल अपने आंतरिक मामलों को सही करने का दावा करते रहते हैं। लेकिन असम, बिहार, केरल, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश व कर्नाटक में हर साल आने वाली बाढ़ और इसे होने वाली बर्बादी इस तरह के दावों की पोल खोल देती है। शासन और प्रशासन तब सक्रिय होता है जब लोग मरने लगते हैं। हमारी आदत हो गई कि मर्ज बढ़ने पर ही उसका इलाज करने की। हम क्यों नहीं पहले ही बचाव के उपाय करते। आज हमारे देश में नवोन्मेष की लहर है। उसका समुचित विस्तार करने की आवश्यकता है। ऐसे तरीके और उपाय विकसित किए जाने चाहिए जो बाढ़ सेहोने वाले नुकसान को कम कर सकें। हम पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बना सकते हैं लेकिन उसके लिए प्रयास करना होगा। हर वर्ष जो चीज दोहराई जाती है, उससे मुक्ति चाहिए। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा हजारों लोगों, मवेशियों को तो अपना ग्रास बनाती ही है, पर्यावरण भी बिगड़ता है और अरबों-खरबों का नुकसान अलग।
’अर्पित शुक्ला, गोंडा

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