ताज़ा खबर
 

चौपाल: इंसाफ की राह व संकीर्ण मानसिकता

चीन जैसे देश में वहां की पुलिस किसी भी अपराधी को पकड़ने और हवालात या जेल में भेजने से पूर्व पूरी छानबीन करती है कि कहीं कोई निरपराध या निर्दोष व्यक्ति का जीवन बर्बाद न हो।

Author Updated: November 23, 2019 3:20 AM
आश्चर्य की बात है कि इस स्थिति के लिए जिम्मेदार पुलिस या कोई भी अपने इस कुकृत्य पर जरा भी अफसोस या ग्लानि भाव में नहीं होता, न उसे इसके लिए कहीं कठघरे में खड़ा किया जाता है।

यह विडंबना ही है कि इस देश के जिस भव्य लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटा जाता है, उस लोकतंत्र को चुनाव के माध्यम से इस देश के करोड़ों गरीब ही बनाते हैं। लेकिन इसी देश में पुलिस अपने किसी कथित अमीर और रसूखदार मित्र को बचाने की खातिर किसी ऐसे निरपराध गरीब को उठा कर जेल भेज देती है, जिसके पास जमानत कराने को भी पैसे नहीं होते। वह दशकों जेलों में सड़ता रहता है, जब तक वह यहां की कथित अधिक मुकदमों के बोझ से चरमराती न्यायिक प्रणाली उसे दोषमुक्त नहीं घोषित करती है। तब तक उसकी सारी जवानी और उसके बच्चों के पढ़ने-लिखने के दिन बीत चुके होते हैं और उसकी बीवी अकेली जीवन गुजारते हुए प्रौढ़ उम्र को भी पार कर चुकी होती है।

कहने का मतलब उसका सब कुछ बर्बाद हो चुका होता है। ज्ञातव्य है यह केवल गरीब और सामान्य कैदियों पर ही लागू होती है, अमीरों और रसूखदार कैदियों के बारे में सभी जानते हैं। आश्चर्य की बात है कि इस स्थिति के लिए जिम्मेदार पुलिस या कोई भी अपने इस कुकृत्य पर जरा भी अफसोस या ग्लानि भाव में नहीं होता, न उसे इसके लिए कहीं कठघरे में खड़ा किया जाता है।

राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार भारत में पकड़े जाने वाले सौ कैदियों में 68.7 फीसद कैदी निर्दोष होते हैं। इसके विपरीत चीन जैसे देश में वहां की पुलिस किसी भी अपराधी को पकड़ने और हवालात या जेल में भेजने से पूर्व पूरी छानबीन करती है कि कहीं कोई निरपराध या निर्दोष व्यक्ति का जीवन बर्बाद न हो। वहां की पुलिस द्वारा पकड़े गए सौ अपराधियों में केवल 0.1 प्रतिशत कैदी ही निर्दोष होते हैं। कितना फर्क है भारत, चीन और विकसित देशों के पुलिस और न्यायतंत्र में!

क्या इस तरह निर्दोष गरीब लोगों के साथ अमानवीय अत्याचार को रोका नहीं जा सकता? इसमें हमारी समूची व्यवस्था ही कठघरे में है। मसलन, जमानत के लिए भी पैसे न हो सकने के कारण लाचार गरीब की सुनवाई कभी वकील साहब, कभी जज साहब के न आने से तो कभी हड़ताल की वजह से अगली तारीख के लिए टाल दी जाती है, लेकिन उसका पैसा हर तारीख पर खर्च हो ही जाता है। इसके अलावा सत्ता का सामंती चरित्र और पुलिस की रसूखदार और धनाढ्य वर्ग से मजबूत गठजोड़ किसी भी गरीब और निर्दोष को उठा कर हवालात में बंद कर देना जैसी स्थितियां भारतीय परिवेश में आम रही हैं।
हमारे नीति-निर्माताओं को केवल अमीरों और रसूखदारों के लिए ही मानवाधिकार की रक्षा करने के साथ भारत के करोड़ों गरीबों के साथ हो रहे इस भीषण त्रासदी और अमानवीय अत्याचार पर भी संजीदगी से सोच कर उनके सहित समस्त परिवार को बर्बाद होने से बचाने के लिए कुछ न कुछ मानवीय उपाय और निदान करना ही चाहिए।

’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

संकीर्ण मानसिकता

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में सहायक प्रोफेसर पद पर मुसलिम शिक्षक की नियुक्ति का विरोध एक अराजक व्यवस्था और सोच का परिचायक है। यह कृत्य विरोध करने वालों की संकीर्ण मानसिकता को बताता है। दुख की बात तो यह है कि इन छात्रों को बाहर से आ रहे कुछ साधु-संत तक भड़काने में लगे हैं। सवाल है कि क्यों नहीं विश्वविद्यालय प्रशासन परिसर में ऐसे भड़काऊ लोगों को अने दे रहा है। हमें तो गर्व और खुशी होनी चाहिए कि संस्कृत भाषा का प्रचलन बढ़ रहा है जिसे हर धर्म के लोग पढ़ना-पढ़ाना चाहते हैं। कई विद्वानों का भी मत है कि हमें किसी भी व्यक्ति की जाति नहीं, वरन ज्ञान देखना चाहिए। विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय का भी यही कहना था कि यह देश हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई अर्थात हर धर्मों का है, इसलिए सबके बीच हमेशा सद्भाव बना रहे और यहां के हर छात्र अपनी श्रेष्ठता पूरे विश्व मे एक महान व्यक्तित्व को साबित करें।

’मनकेश्वर महाराज ‘भट्ट’, मधेपुरा

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 चौपाल: समृद्ध संस्कृति व देशभक्ति का दायरा
2 चौपाल: किसकी भाषा व सवालों पर परदा
3 चौपाल: रेलवे का निजीकरण, प्लास्टिक का जहर व वशिष्ठ नारायण अमर रहें!
जस्‍ट नाउ
X