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चौपाल: हमारा गणतंत्र व कानून के बरक्स

सीएए, एनआरसी या एनपीआर को लेकर पूरा देश आंदोलित है।

Author नई दिल्ली | January 25, 2020 1:50 AM
असम में एनआरसी आने के बाद की स्थिति पर गौर करें तो एक राज्य में एनआरसी के लिए छह साल लगे।

शौर्य संस्कृति का पर्व गणतंत्र है,

सैन्य पराक्रम का सौंदर्य गणतंत्र है।

सैनिक बलों का उत्साह वर्धन है,
ये लोकतंत्र का त्योहार गणतंत्र है।
जनता ने जो जनता को सौंपा,
ऐसा कोई उपहार गणतंत्र है।
संविधान जिसका नाम पड़ा हो,
ऐसा पवित्र ग्रंथ गणतंत्र है।
जनमानस कि अभिलाषा है ,
भारतवर्ष का प्राण गणतंत्र है।
सबके हित की रक्षा करता,
ऐसा कोई कवच गणतंत्र है।
वर्ष दर वर्ष जो दृढ़ होता है,
प्रतिज्ञा का परण गणतंत्र है।
छाया में जिसकी देश है पूरा,
ऐसा कोई वृक्ष गणतंत्र है।

’डॉ राज सिंह, दिल्ली

कानून के बरक्स

सीएए, एनआरसी या एनपीआर को लेकर पूरा देश आंदोलित है। एक तरफ इसके विरोध में जगह जगह महिलाएं अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन कर रही है तो दूसरी ओर सरकार की ओर से भी मंत्रियों से लेकर भाजपा कार्यकर्ता लोगों को समझाने का प्रयास कर रहे हैं। प्रश्न यह है कि लोगों का भरोसा अब सरकार या नेताओं के वायदे पर क्यों नहीं हो रहा है? दरअसल नोटबंदी और धारा 370 के लागू होने के बाद कश्मीर के जो हालात बने और लोगों को गुमराह किया जाता रहा, इससे लगातार लोगों का विश्वास सरकार और उसके नुमाइंदे के कथनों से उठता गया है। सरकार के इस कानून से कुछ सवाल लोगों के मन में उठ रहे है। आधार कार्ड इसीलिए बनवाया गया कि सभी भारतीय लोगों की एक पहचान होनी चाहिए। हालांकि इसका विरोध भी शुरुआती दौर में भाजपा के द्वारा किया गया, जब वह विपक्ष में थी। लेकिन बाद में आधार कार्ड बनने से एक पहचान पत्र तो मिला भारतीयता का! अब आज फिर हमें भारतीय होने का प्रमाण पत्र चाहिए, समझ से परे है।

दूसरी बात, असम में एनआरसी आने के बाद की स्थिति पर गौर करें तो एक राज्य में एनआरसी के लिए छह साल लगे। करीब 52 हजार कर्मचारी और आठ सौ करोड़ रुपए खर्च हुए। बावजूद इसके उन्नीस लाख लोगों को इस सूची से बाहर होना पड़ा। हो सकता है कि आंकड़ा थोड़ा बहुत आगे पीछे हो। लेकिन कहने का तात्पर्य यह है कि एक राज्य मे इतनी पेचीदगी है तो पूरे देश में क्या होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। मान लिया कि पूरे देश में एनआरसी, एनपीआर लागू करने के बाद एक अनुमान के तौर पर लगभग दो-तीन करोड़ लोगों को शरणार्थी मान लिया जाए। लेकिन सरकार के पास इन लोगों के लिए कोई योजना नहीं है कि उसे कैसे और क्या करना है! अगर है तो इसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। असम की आबादी तीन करोड़ के आसपास है। ऐसे में इन लोगों के लिए एक अलग राज्य की परिकल्पना जैसी स्थिति लगती है।

तीसरा तथ्य यह है कि जिस देश में आधार, पासपोर्ट सहित महत्त्वपूर्ण कागजात अधिकारियों को घूस देकर बनाए जा सकते हैं, क्या यह आशंका नही कि पहुंच वाले, पैसे वाले और रसूखदार लोगों द्वारा ऐसे भ्रष्ट तरीके से कोई भी प्रमाण पत्र हासिल कर सकते हैं? ऐसे में गरीब और बेसहारा, आदिवासी, गांव में रहने वाले लोग ज्यादा परेशान किए जाएंगे। फिर लोग महीनों कतार में खड़े होकर अपनी नागरिकता प्रमाण पत्र बनवाने के लिए परेशान रहेंगे। पैसे वाले और रसूख वाले को वैसे ही समय कट जाएगा जैसे नोटबंदी में कट गया था। इन बिंदुओं पर विचार किए बगैर ऐसे कानून से आम लोगों को कोई फायदा हमें नहीं लगता।

’अशोक कुमार, बेगूसराय, बिहार

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