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चौपाल: राजनीति में महिलाएं

महिला आरक्षित सीटों पर किसी न किसी महिला को ही चुना जाना होता है, लेकिन अक्सर हम देखते हैं कि चुनाव जीतने के बाद भी उस महिला के पति का ही आदेश चलता है।

संसद, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत अपने पड़ोसी छोटे और गरीब माने जाने वाले देशों जैसे नेपाल, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भी पीछे है। भारत में अशिक्षा और गरीबी दो ऐसे कारण हैं जिनसे यहां का पूरा समाज, जिसमें औरतें भी शामिल हैं, राजनीतिक रूप से जागरूक नहीं हैं। जिसे अगले वक्त की रोटी की चिंता हो, वह राजनीति के विषय में कैसे सोच सकता है! अपनी भूख मिटाने के प्रयास में ही उसकी सारी दिमागी और शारीरिक ऊर्जा चली जाती है।

सामान्यत: भारतीय समाज में हर क्षेत्र में पुरुषों का वर्चस्व चलता है। महिलाएं उसके आदेश का पालन करने को मजबूर होती हैं। महिला आरक्षित सीटों पर किसी न किसी महिला को ही चुना जाना होता है, लेकिन अक्सर हम देखते हैं कि चुनाव जीतने के बाद भी उस महिला के पति का ही आदेश चलता है। वह अपने पति की मर्जी के बगैर एक भी निर्णय नहीं कर सकती!

भले ही मौजूदा लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए बीजू जनता दल ने ओड़ीशा में 33 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने 41 प्रतिशत सीटें आरक्षित की हों, लेकिन जब तक महिलाएं जागरूक नहीं होगीं, तब तक इस आरक्षण का कोई औचित्य नहीं है। इसलिए राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ हमेंं समग्र समाज की शिक्षा और रोजगार की स्थिति भी सुदृढ़ करनी होगी।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

वैश्विक ताप वृद्धि
ग्लोबल वार्मिंग विश्व के लिए एक बड़ा पर्यावरणीय और सामाजिक मुद्दा है। सूूरज की रोशनी को लगातार ग्रहण करते हुए हमारी पृथ्वी दिनोंदिन गर्म होती जा रही है जिससे वातावरण में कार्बन डाईआॅक्साइड का स्तर बढ़ रहा है। इसके लगातार बढ़ते दुष्प्रभावों से गंभीर समस्याएं जन्म ले रही हैं जिनके प्रति बड़े स्तर पर सामाजिक जागरूकता की जरूरत है। ऐसा आकलन किया गया है कि अगले 50 या 100 वर्षों में धरती का तापमान इतना बढ़ जाएगा कि जीवन के लिए ढेर सारी मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी।

धरती पर कार्बन डाईआॅक्साइड जैसी विनाशक गैस के बढ़ने की मुख्य वजह जीवाश्म र्इंधन, जैसे कोयला और तेल का अत्यधिक इस्तेमाल और जंगलों की कटाई है। धरती पर घटते पेड़ों की वजह से कॉर्बन डाईआक्साइड का स्तर बढ़ता है। पेड़-पौधे ही इस हानिकारक गैस को इस्तेमाल करके कम करते हैं जबकि इंसानों द्वारा इसे कई रूपों में छोड़ा जाता है। बढ़ते तापमान की वजह से समुद्र के जल स्तर में वृद्धि, तूफान, खाद्य पदार्थों की कमी, तमाम तरह की बीमारियों आदि का खतरा बढ़ जाता है।
’सुशील वर्मा, गोरखपुर विश्वविद्यालय

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