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चौपाल: जवानों के साथ

सेना की तुलना में कम सुविधाओं और वेतन के चलते हर वर्ष बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बलों के जवान नौकरी छोड़ देते हैं। विपरीत परिस्थितियों में काम करने और परिवार से दूर रहने का दबाव उन्हें कोई अन्य बेहतर विकल्प तलाशने पर मजबूर कर देता है।

PULWAMA ATTACKविंग कमांडर अभिनंदन/ पुलवामा आतंकी हमले की तस्वीर (PTI/Express)

पुलवामा के आतंकी हमले में सीआरपीएफ के बयालीस जवान शहीद हुए थे और एक मार्च को भी कुपवाड़ा में आतंकियों से लड़ते हुए इसी बल के दो जवान शहीद हो गए थे। सीआरपीएफ के जवानों की मांग है कि जब वे काम सेना के जवानों की तरह करते हैं तो फिर उन्हें वेतन, सम्मान और सुविधाएं सेना के जवानों की तरह ही दी जानी चाहिए। जहां एक ओर ये अर्धसैनिक बल देश के अंदर आतंकवादियों और नक्सलियों से जम कर लोहा लेते हैं वहीं सीमा पर भी ये सर्दी, गर्मी और बर्फबारी में पूरी हिम्मत से डटे रहते हैं और जरूरत पड़ने पर देश पर अपनी जान भी न्योछावर कर देते हैं। इन जवानों की शिकायत है कि सरकार उनके साथ लगातार भेदभाव कर रही है; यहां तक कि जवानों को शहीद का दर्जा भी नहीं दिया गया है।

आम जनता को शायद सेना और अर्धसैनिक बल के जवानों में बहुत अधिक अंतर न दिखे पर इन्हें मिलने वाले वेतन और सुविधाओं में काफी अंतर है। छुट्टियों की कमी, असुरक्षित माहौल, अधिकारियों का दुर्व्यवहार, पद के अनुसार कार्य न मिलना, कम वेतन, पेंशन आदि और बहुत-से कारण हैं जो इन जवानों को तनाव से भर देते हैं। इसी बढ़ते तनाव के कारण जवानों द्वारा अधिकारियों से मारपीट करने की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती रहती हैं। सेना की तुलना में कम सुविधाओं और वेतन के चलते हर वर्ष बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बलों के जवान नौकरी छोड़ देते हैं। विपरीत परिस्थितियों में काम करने और परिवार से दूर रहने का दबाव उन्हें कोई अन्य बेहतर विकल्प तलाशने पर मजबूर कर देता है।

हालिया राजनीति में सेना और अर्धसैनिक बलों के नाम पर लोगों को भावुक करने की राजनीति अपने चरम पर है लेकिन इन जवानों की समस्याओं का हल खोजने का प्रयास किसी स्तर पर होता नहीं दिख रहा। देशभक्ति सिर्फ सोशल साइट्स और राजनीतिक मंचों पर चीख कर नहीं होती बल्कि उसके लिए नीतिगत और व्यावहारिक स्तर पर कदम उठाने पड़ते हैं। देश के लिए मरने वाला हर जवान शहीद होता है। जब दुश्मन की गोली कोई भेदभाव नहीं करती तो सरकार को भी संवेदनशील नजरिया अपनाना चाहिए। अर्धसैनिक बलों की मांगें बहुत पुरानी हैं पर वर्षों से आंदोलन कर रहे पूर्व जवानों को आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला।
’अश्वनी राघव ‘रामेंदु’, नई दिल्ली

सम्मान का पाठ
देश के साथ-साथ समूचे विश्व में आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया। सभी ने विभिन्न माध्यमों के जरिए महिला सुरक्षा का मुद्दा उठाया, लेकिन क्या तमाम प्रयासों के बावजूद महिलाएं सचमुच पूर्ण रूप से सुरक्षित हो पाई हैं?
आज हम अपनी मां-बहनों की तो इज्जत करवाना चाहते हैं लेकिन बाकी महिलाओं की सुरक्षा का क्या! आएदिन अखबारों-टीवी चैनलों की खबरों मेंं किसी नई निर्भया की कहानी देखने को मिल जाती है। महिलाओं को मारने-पीटने की खबरें आम हो चली हैं। देश में महिला सुरक्षा के लिए हमें सोच को सुधारना होगा। बेटियों को समझाने से पहले बेटों को स्त्रियों के सम्मान का पाठ पढ़ाना होगा। महज कानून बनाने कुछ नहीं होगा, उसका डर भी लोगों में बैठाना होगा। सोच बदलेगी तो देश बदलेगा!
’पवन तिवारी, राम लाल आनंद कॉलेज, दिल्ली

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