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चौपाल: तथ्यों के साथ, स्कूलबंदी क्यों व गंभीर कब

स्कूल बंद होने से करोड़ों परिवारों की दिनचर्या बिगड़ जाती है।

Author Published on: November 16, 2019 2:54 AM
हवा में पराली के धुएं की मात्रा बढ़ने से वायु गुणवत्ता सूचकांक 500 के पार यानी अत्यंत गंभीर स्थिति में पहुंच गया।

जिस राफेल को लेकर एक राष्ट्रीय पार्टी के वरिष्ठ नेता ने लोकसभा चुनाव और उसी समय कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में लगातार कुप्रचार का अभियान चला रखा था और एक नया नारा गढ़ दिया था, ‘चौकीदार चोर है’ उसे उच्चतम न्यायालय ने पूरी तरह खारिज कर दिया। यहां बात इस एक विपक्षी नेता की नहीं है, सत्ता पक्ष और विपक्ष के भी सभी नेताओं से आग्रह है कि चुनावी राजनीति में कभी भी गलत तथ्यों के साथ न उतरें। हो सकता है इससे मतदाता तो न प्रभावित हों लेकिन भविष्य में उनकी खुद की छवि प्रभावित हो सकती है।

’रमेश माहेश्वरी, सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश

स्कूलबंदी क्यों

दिल्ली में कोहरा, गर्मी, ठंड या प्रदूषण बढ़ जाने और बारिश हो जाने पर झट स्कूल बंद करा दिए जाते हैं। यह पूर्णतया अनुचित है। स्कूल बंद होने से करोड़ों परिवारों की दिनचर्या बिगड़ जाती है। छात्र कोई कार्य न होने पर सारा दिन या कई दिन घर में उदास हो जाते हैं। कनाडा में शिशु भारी हिमपात में भी स्कूल जाते हैं। स्कूल खुले होने से छात्र को हर मौसम का अभ्यास रहता है। इसके मद्देनजर स्कूल हर मौसम में हर हालत में खुले होने चाहिए। मौसम विपरीत लगने पर जो छात्र चाहे वह न आए। दिल्ली सरकार के अनुसार दिल्ली में सड़कें, स्कूल भवन आदि बेहतर हैं। बेहतर सड़कों, बेहतर स्कूल भवनों के बावजूद स्कूल बंद रखना बेहतर नहीं है।

’जीवन मित्तल, मोती नगर, नई दिल्ली

गंभीर कब

मौसमी उतार-चढ़ाव और आंशिक राहत के बाद दिल्ली-एनसीआर में पिछले कुछ दिनों से वायु प्रदूषण फिर गंभीर स्तर पर पहुंच गया है। पीएम 2.5 और 10 की मात्रा में खासा इजाफा देखने को मिला। हवा में पराली के धुएं की मात्रा बढ़ने से वायु गुणवत्ता सूचकांक 500 के पार यानी अत्यंत गंभीर स्थिति में पहुंच गया। पराली के धुएं के साथ हवा की बदली दिशा और जम्मू कश्मीर में सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ के कारण देश की राजधानी फिर गैस चैंबर बन गई है। नवंबर में यह दूसरा मौका है जब ऐसे हालात बने हैं।

पराली के धुएं के चलते दिल्ली-एनसीआर में आसमान पर ‘स्मॉग’ की गहरी परत छाई हुई है। इसके चलते दिन के समय भी दृश्यता प्रभावित हुई है। अनुमान लगाया जा रहा है कि इससे जल्द ही राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। इस सबके बीच सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी हुई है महज आॅड-इवन के भरोसे। आखिर इस गंभीर समस्या के स्थायी हल के लिए सरकार कब गंभीर होगी?

’नीतीश कुमार पाठक, आश्रम, नई दिल्ली

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