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चौपाल: कैसा लोकतंत्र? लोकतंत्र और सवाल व मंदी की मार

आज लोगों के लिए लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ यही है कि नारेबाजी करना, धरना देकर अपनी बात मनवाना या फिर किसी स्थान को बंद घोषित कर देना।

Author Published on: September 18, 2019 3:58 AM
सांकेतिक तस्वीर।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, लेकिन इसका स्वरूप दिन-प्रतिदिन बदलता जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हम लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा से वंचित होते जा रहे हैं। या फिर, लोकतंत्र के नाम पर भारत देश एक उदाहरण मात्र बन कर रह गया है। इस लोकतांत्रिक देश में हमने वोट देने और सरकार चुनने का अधिकार तो अपनाया है, लेकिन बावजूद इसके आज भी हमने जाति, धर्म और रंग के आधार पर भेदभाव पाया है। इतना ही नहीं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक को दबाया जा रहा है। देश के लोकतांत्रिक राष्ट्र घोषित होने के इतने सालों बाद भी, क्यों आज भारतीय लोकतंत्र खतरे में पड़ता चला जा रहा है? या हम लोकतंत्र की परिभाषा भूल गए हैं या हमारा देश जनतंत्र से पुन: राजतंत्र के रास्ते पर बढ़ता नजर आ रहा है?

’ललित कुमार प्रजापति, आंबेडकर नगर, उप्र

लोकतंत्र और सवाल

पूरे विश्व में पंद्रह सितंबर को अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मनाया गया। लोकतंत्र का अर्थ है कि लोगों के पास यह अधिकार है कि वह अपनी सरकार को निष्पक्ष रूप से चुन सके। परंतु आज इक्कीसवीं सदी में आमजन के जहन में इस लोकतंत्र की परिभाषा पूर्ण रूप से बदल चुकी है और इस बदलाव का प्रकाश मतों के समय में नजर आता है जब समाज के हिस्से के कुछ ही लोग अपनी सराकर को चुनने के लिए लाइनों में लगे होते हैं।

आज लोगों के लिए लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ यही है कि नारेबाजी करना, धरना देकर अपनी बात मनवाना या फिर किसी स्थान को बंद घोषित कर देना। क्या हमारे एतिहासिक पन्नों पर लोकतंत्र की परिभाषा यही थी? जबकि लोगों को आज इसके बारे में और भी जागरूक करने की जरूरत है, क्योंकि उन्हें लगता है कि अपनी बात मनवाने का जरिया है लोकतंत्र, जबकि लोकतंत्र तो एक जरिया है अपने समाज और अपने देश के लिए एक सही सरकार चुनने का। लेकिन लोग इस परिभाषा से भटक कर लोकतंत्र का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं।

’जानवी बिट्ठल, जलंधर

मंदी की मार
भारत को अगले पांच साल में पांच लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था बनाना शायद मुश्किल जान पड़ता है, क्योंकि मंदी का आलम ये है कि भारत में प्रस्तावित निवेश पिछले चौदह वर्षों के निम्नतम स्तर पर है। पिछले साल आरबीआइ द्वारा चार बार कुल मिला कर एक फीसद के आसपास ब्याज दरों को कम किया गया है, फिर भी निवेश दर में कुछ खास असर नही पड़ा है। एशियाई विकास बैंक (एडीबी), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि ने इस वित्त वर्ष के लिए लगभग सात फीसद की वृद्धि दर का अनुमान लगाया था, लेकिन वृद्धि दर अभी तो पांच फीसद के आसपास ही है, क्योंकि जिन आंकड़ों के माध्यम से इन्होंने ये अनुमान लगाया था, वे सरकार द्वारा केवल संगठित क्षेत्र के डाटा के हिसाब से था।

यदि हम किसी देश की वित्तीय स्थिति को समझना चाहते हैं तो हमें संगठित व असंगठित क्षेत्र दोनों का समेकित अध्ययन करना होगा। असंगठित क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था में लगभग पैंतालीस फीसद का योगदान देता है और इसी क्षेत्र की लगभग चौरानवे फीसद नौकरियां हैं। इनमें से ज्यादातर नौकरियां नोटबंदी और जीएसटी के बेहतर ढंग से क्रियान्वित नहीं होने से चली गर्इं। आज मंदी के दौर में इस क्षेत्र के रोजगार पर बुरा असर पड़ा है। सरकार को इस क्षेत्र की हालत सुधारने पर ध्यान देने की जरूरत है।

’अरविंद पांडेय, सिद्धार्थनगर, उप्र

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