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चौपाल: जल संकट और सबक

चेन्नई में बेशक आजकल जल संकट चल रहा है, लेकिन देश के बहुत से और राज्य भी ऐसे संकट का सामना कर रहे हैं। इन राज्यों का भूजल स्तर गिरता जा रहा है।

Author June 25, 2019 1:49 AM
जल संकट की समस्या से लोगों का हाल बेहाल फोटो सोर्स- फाइनेंशिल एक्सप्रेस

चेन्नई आजकल गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। इस जल संकट ने लोगों को भारी मुश्किल में डाल दिया है। यहां बारिश न होने के कारण जल के प्राकृतिक स्रोत भी सूख गए हैं, इस कारण यहां जल संकट और गहराता जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ नीति आयोग की रिपोर्ट ने जो यह रिपोर्ट जारी की है कि हमारे देश में 2030 तक चालीस फीसद आबादी के पास पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं होगा, काफी चिंताजनक है। चेन्नई में बेशक आजकल जल संकट चल रहा है, लेकिन देश के बहुत से और राज्य भी ऐसे संकट का सामना कर रहे हैं। इन राज्यों का भूजल स्तर गिरता जा रहा है। मोदी सरकार ने 2024 तक देश के हर घर तक नल से जल की योजना का लक्ष्य निर्धारित किया है।

अगर बारिश के कम होने के कारणों पर ध्यान नहीं दिया, पानी को संभालने, नदियों को गंदा करने से बाज नहीं आए और भूजल के गिरते स्तर को रोकने के लिए सरकारों और आमजन ने गंभीरता नहीं दिखाई तो वह दिन दूर नहीं जब देश का हर शहर और हर गांव पीने वाले साफ पानी की एक-एक बूंद को तरसने लगेगा। ऐसे में देश के हर घर में नल तो सरकार पहुंचा भी देगी, लेकिन नल में जल नहीं होगा। यहां यह भी कहना उचित होगा कि जब देश में सूखे की स्थिति पैदा होती है तब पानी को बचाने के उपाय और तौर तरीकों की बात सरकारें, प्रशासन और लोग करने लगते हैं। लेकिन जब गर्मी का मौसम चला जाता है तो सभी अगली गर्मी के मौसम और सूखा पड़ने तक लंबी तान के सो जाते है। अगर आने वाली पीढ़ी के लिए साफ पानी बचा कर रखना है तो सबको मन में एक प्रण लेना होगा कि हर हाल में पानी बचाना है।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

युद्ध का खतरा
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध जिस तरह के युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं उससे कई देशों की आर्थिक स्थिति संकट में पड़ सकती है। अमेरिका ने ईरान पर साइबर हमला कर उसके राकेट और मिसाइल लांचर वाले कंप्यूटर को जाम करने का दावा किया है, वहीं ईरान भी इसके घातक नतीजों की धमकी दे रहा है। युद्ध से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अस्थिरता का माहौल बन रहा है और तेल के दाम बढ़ सकते हैं। अगर दोनों देशों में युद्ध हुआ तो यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए प्रतिकूल होगा।
’विविधा, डीएसजे, दिल्ली विवि

दक्षिण अफ्रीका का संकट
पिछली आठ मई को दक्षिण अफ्रीका में हुए चुनाव के नतीजे में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस को अट्ठावन फीसद मतों के साथ जीत हासिल हुई थी। तब लगा था कि देश में सब कुछ ठीक-ठाक होगा, लोग खुश होंगे, अर्थव्यवस्था सुधरेगी, जीडीपी बढ़ेगी, बेरोजगारी कम होगी। मगर ये क्या अचानक वहां के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा का इकबालिया बयान आ गया। उन्होंने कहा, देश का माली हालत ठीक नहीं है। देश पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों का कर्ज बढ़ता जा रहा है। बेरोजगारी सत्ताईस फीसद पर है और युवाओं में ये प्रतिशत पचास के ऊपर चला गया है। इसका मतलब देश इस समय डूबने के कागार पर है। सवाल है कि रंगभेद से तो मुक्ति मिल गई, मगर गुरबत से देश कब मुक्त होगा?
’जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर

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