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चौपाल: संकट की दस्तक

आगामी मानसून पर अल-नीनो (पूर्वी प्रशांत महासागर में होने वाली उथल-पुथल के कारण बारिश में कमी) का संकट बताया जा रहा है जिसके चलते सामान्य से लगभग चार फीसद कम बारिश के आसार हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर

मई महीने की शुरुआत में ही बढ़ते तापमान के साथ देश के कुछ भागों में जल संकट और सूखे के संकेत मिलने लगे थे। अब महाराष्ट्र की डेढ़ सौ तहसीलें सूखे से प्रभावित बताई जा रही हैं और उत्तर भारत के भी कुछ हिस्से जल संकट की गिरफ्त में हैं। इसी बीच जहां एक ओर मानसून पूर्व मार्च-अप्रैल में होने वाली बारिश में 27 फीसद की कमी देखी गई वहीं आगामी मानसून पर अल-नीनो (पूर्वी प्रशांत महासागर में होने वाली उथल-पुथल के कारण बारिश में कमी) का संकट बताया जा रहा है जिसके चलते सामान्य से लगभग चार फीसद कम बारिश के आसार हैं। आंकड़ों की मानें तो भारत में विश्व की अठारह फीसद आबादी रहती है और उसके लिए उपलब्ध जल स्रोत विश्व की तुलना में सिर्फ चार फीसद है।

नतीजतन, 2018 की नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि हम 2030 तक एक गंभीर जल संकट की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि पानी की उपलब्धता और उसकी खपत के बीच की खाई को कैसे भरा जाए? इस संकट से निपटने के लिए सबसे पहले उपलब्धता प्रबंधन से ज्यादा उपयोगिता प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। नागरिकों में जागरूकता लाने के साथ-साथ उन पर पानी के सीमित उपयोग के लिए दबाव बनाना होगा। दूसरा, चूंकि करीब 80 फीसद पानी कृषि सिंचाई में उपयोग होता है, ऐसे में सूखे और पानी की मार झेल रहे राज्यों के किसानों को कम पानी वाली फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। बारिश के सामान वितरण में बड़े अंतर के चलते प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों तरह के जल संरक्षण साधनों मसलन, बांध, वाटर हार्वेस्टिंग, जलाशय आदि पर गंभीरता से प्रयास करने होंगे। अंतत: जलवायु परिवर्तन से उपजे इस संकट से निपटने के लिए सरकार और नागरिकों को मिलकर गंभीरता से काम करना होगा ताकि उस संकट से पार पाया जा सके जिसके संकेत दिखाई दे रहे हैं।
’संजय दुबे, नई दिल्ली

ताक पर मर्यादा

हाल ही में संपन्न सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा राजनीतिक मर्यादाओं का उल्लघंन किया गया। यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र का एक काला सच है जिसमें अमूमन धारणा है यहां चुनाव ‘काम के बूते नहीं बल्कि भावना के दम पर’ जीता जाता है। विभिन्न राजनीतिक दल जनता की इसी भावुकता का फायदा उठा कर उसे वोट में रूपांतरित करते आ रहे हैं। इस लोकसभा चुनाव में जहां प्रधानमंत्री पद की गरिमा का विपक्षी दलों ने ध्यान नहीं रखा तो वहीं दूसरी ओर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के कातिल को भी नमन किया गया क्योंकि कहा जाता है कि देश का एक कट्टर वर्ग इससे खुश होता है। आम जनता को इन सब राजनीतिक हथकंडों से कुछ विशेष फायदा नहीं होने वाला। अगर गौर किया जाए तो ऐसे बयान अपरिपक्व राजनेताओं द्वारा दिए जाते हैं जो चुनावी बरसात में ही जन्म लेते हैं। ऐसे बयान जो उन्माद को बढ़ावा दें उनसे राजनीतिक दलों को यह कह कर पल्ला नहीं झाड़ना चाहिए कि ये अमुक नेता के निजी विचार हैं। राजनीतिक दल उचित व परिपक्व लोगों को ही टिकट दें। इसके लिए आवश्यक है कि दलों के अंदर एक संहिता हो, एक कैडर हो जिसमें वे अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दें और अपनी विचारधारा से भलीभांति अवगत कराएं। उसके बाद टिकट दें। इससे योग्य नेता तैयार होंगे और कुशल नेतृत्व के अभाव और दलबदल जैसी समस्याएं समाप्त हो सकती हैं।
’अनूप जैन, दिल्ली विश्वविद्यालय

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