ताज़ा खबर
 

चौपाल: भूख से जंग व समय की मांग

आज तक देश में भूख के कारण हो रही मौतों के पीछे किसी की कोई जवाबदेही तय नहीं हो सकी है।

Author Published on: October 19, 2019 2:05 AM
इस रिपोर्ट में भारत को उन 45 देशों के साथ रखा गया है जहां भूख को लेकर हालात चिंताजनक हैं।

राफेल, चंद्रयान या तेजस ट्रेन जैसी हमारी तमाम कामयाबियों को 2019 के वैश्विक भूख सूचकांक के आंकड़े मुंह चिढ़ा रहे हैं। इनके मुताबिक भूख, कुपोषण व बाल विकास के मामले में 21वीं सदी में विश्व शक्ति बनने का दावा करने वाला भारत 117 देशों की सूची में 102 वें स्थान पर है। यह भारत का लगातार निराशाजनक प्रदर्शन है। 2018 में 119 देशों की सूची में वह 103 वें स्थान पर था। वैश्विक भूख सूचकांक दुनिया भर में भूख और कुपोषण को अपने चार पैमानों पर नाप कर सभी देशों की एक सूची तैयार करता है जिसमें कुपोषण, बाल मृत्युदर, उम्र के अनुपात में कम विकास और लंबाई के अनुपात में कम वजन को आधार बनाया जाता है। इस रिपोर्ट में भारत को उन 45 देशों के साथ रखा गया है जहां भूख को लेकर हालात चिंताजनक हैं। बल्कि इस सूचकांक में पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों ने भी भारत से बेहतर प्रदर्शन किया है। इस सूचकांक में पाकिस्तान 94 वें, बांग्लादेश 88 वें और श्रीलंका 66 वें स्थान रहा।

भारत का संविधान लोगों को भोजन का अधिकार और जीने का अधिकार देता है। इस रिपोर्ट ने उन तमाम सरकारी योजनाओं की नाकामयाबी की ओर इशारा किया है जो आजादी से लेकर अब तक भारत को भूख से मुक्त कराने के लिए बनाई गई थीं। साथ ही इसने भारत के खोखले विकास की तरफ इशारा किया है जो एक तरफ तो मंगल पर पहुंच रहा है वहीं दूसरी तरफ अपने नागरिकों को खानपान जैसी मूलभूत सुविधाएं तक मुहैया कराने में समर्थ नहीं हो पा रहा है।

उधर देश की एक समस्या यह भी है कि यहां प्रतिवर्ष लाखों टन अनाज गोदामों में सड़ जाता है और भारी मात्रा में खाना बर्बाद होता है। आज तक देश में भूख के कारण हो रही मौतों के पीछे किसी की कोई जवाबदेही तय नहीं हो सकी है। यदि समय रहते भारत को भूख की इस समस्या से निजात नहीं दिलाई गई तो यह आने वाले समय में भारत के भविष्य के लिए एक बेहद चिंताजनक स्थिति उत्पन्न करेगा। इस तरह तो तकनीक के कंधे से कंधा मिलाकर चलता भारत और दूसरी तरफ भूख से जंग लड़ता भारत कभी भी एक साथ नहीं आ पाएगा।

’शक्तिप्रताप सिंह, रश्मि खंड, लखनऊ

समय की मांग

एक बार इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक से बनी वस्तुओं के विकल्प रातोंरात उपलब्ध नहीं कराए जा सकते, लेकिन इस दिशा में तेजी से कदम उठाए जाने जरूरी हैं। प्लास्टिक के खिलाफ अभियान केवल प्लास्टिक की थैलियों की जगह जूट या कपड़े के थैले या फिर प्लास्टिक के कप के स्थान पर कुल्हड़ के इस्तेमाल को बढ़ावा देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

आखिर इसकी अनदेखी कैसे की जा सकती है कि वर्तमान में खान-पान की लगभग प्रत्येक सामग्री की पैकिंग प्लास्टिक में हो रही है? इसके अलावा दूध भी प्लास्टिक की थैलियों में मिल रहा है। इसे देखते हुए समय की मांग है कि वे कंपनियां भी इस अभियान में योगदान देने के लिए सक्रिय हों जो अपने उत्पादों की पैकिंग प्लास्टिक में करती हैैं।

’हेमंत कुमार, गोराडीह, भागलपुर, बिहार

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 चौपाल: दिल्ली की हवा, अश्लीलता का प्रसार व पराली से खाद
2 चौपाल: दुरुस्त आयद व पटाखों से परहेज
3 चौपाल: बेकाबू जुबान, गांगुली से उम्मीदें व कड़ी कार्रवाई हो