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चौपाल: चीन का स्वार्थ

भारत चीन के बीच व्यापार आज लगभग सौ अरब डालर सालाना तक पहुंच चुका है। लगभग एक हजार चीनी कंपनियों ने अरबों डालर का निवेश भारत में किया हुआ है।

Author Published on: October 14, 2019 5:01 AM
तमिलनाडु के महाबलीपुरम में शुक्रवार को भेंट के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग। (फोटोः पीटीआई)

चीनी राष्ट्रपति शी जिनफिंग की भारत यात्रा से पूर्व चीन की ओर से बयान आया था कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच का आपसी मसला है जिसे दोनों देशों को परस्पर शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। कश्मीर पर चीन का अचानक पलटना एक तरफ भारतीय पक्ष को मजबूत करता है, तो चीन के इतिहास को देखते हुए हमें निरंतर सजग रहने की जरूरत भी रेखांकित करता है। पहले भी पंचशील समझौता करके चीन भारतीय सीमाओं का अतिक्रमण कर हमारी संप्रभुता को चुनौती देने का दुस्साहस कर चुका है। कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद चीन लगातर पाकिस्तान के साथ खड़ा नज़र आया है। उसने संयुक्त राष्ट्र से भी कश्मीर मुद्दे पर संज्ञान लेने की मांग की थी। लेकिन अब इसे द्विपक्षीय मुद्दा बता कर उसने पलटी मारी है तो इसके पीछे उसके अपने स्वार्थ हैं। वह अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध, हांगकांग में विरोध, उईगर में मुसलमानों के उत्पीड़न के कारण खराब होती छवि जैसी मुश्किलों में फंसा है।

इन संकटों से निकलने के लिए वह अपनी छवि को अच्छा बनाने के लिए ही निष्पक्ष होने का दिखावा कर रहा है। भारत चीन के बीच व्यापार आज लगभग सौ अरब डालर सालाना तक पहुंच चुका है। लगभग एक हजार चीनी कंपनियों ने अरबों डालर का निवेश भारत में किया हुआ है। बढ़ते व्यापार और भारतीय बाजार की अनदेखी करना आज चीन तो क्या किसी भी देश के लिए संभव नहीं है। चीन के बदलते हुए रुख की एक वजह यह भी हो सकती है, लेकिन फिर भी उसकी गतिविधियों पर नजर रखने की जरूरत है।
’बिजेंद्र कुमार, आंबेडकर कालेज, दिल्ली

सकारात्मक पहल
यह प्रसन्नता की बात है कि दिल्ली की लगभग पांच सौ दुर्गा पूजा समितियों ने दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन इस बार कृत्रिम तालाबों में किया और पर्यावरण की रक्षा में अपना अमूल्य योगदान दिया। ये कामचलाऊ तालाब दिल्ली सरकार ने बनवाए थे, ताकि यमुना को प्रदूषण से बचाया जा सके। बड़ी बात यह है कि लोग अब पर्यावरण रक्षा की आवश्यकता, उसके महत्त्व और उसके प्रति अपने दायित्व को समझ रहे हैं। कृत्रिम तालाबों नहीं होने से लोग यमुना में मूर्ति विसर्जन करते थे और इससे घौटों पर गंदगी फैलती थी और नदी भी प्रदूषित हो जाती थी। निसंदेह इस सकारात्मक पहल के लिए दिल्ली सरकार प्रशंसा की पात्र है।

इसके पहले भी छठ के अवसर पर इस दिल्ली सरकार ने कालोनियों के आसपास इसी प्रकार के छोटे-छोटे कृत्रिम तालाबों का प्रबंध करके लोगों को यमुना में जाने की कठिनाई से बचाने की पहल की थी। इसका लाभ यह हुआ था कि यमुना के घाटों की स्वच्छता और सुंदरता की भी रक्षा हुई, क्योंकि हजारों की संख्या में श्रद्धालु वहां जाते और पूजा सामग्रियों के अवशिष्ट और प्लास्टिक की थालियां घाटों पर फेंक देते थे। इस प्रकार के सहयोग को देखते हुए यह विश्वास करना कठिन नहीं है कि पर्यावरण को ध्यान में रख कर ही लोग दीपावली में उच्चतम न्यायलय द्वारा सुझाए गए हरित पटाखे ही छोड़ेंगे। इससे दिसंबर-जनवरी हर साल छाने वाली धुंध भी कम पड़ेगी। पर्यावरण को बचाने की रोई भी पहल बिना जनभागीदारी के संभव नहीं हो सकती। अगर हमें वातावरण को बचाना है और हवा को साफ रखना है तो अपनी जिम्मेदारियां भी निभानी होंगी।
’राजेंद्र प्रसाद सिंह, दिल्ली

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