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चौपाल: कानून के बावजूद

बहरहाल, तीन तलाक के खिलाफ कानून तो और सरकार ने बना दिया है, पर समाज में शिक्षा को बढ़ावा देकर, जागरूक करने और मुसलिम युवाओं को आगे आकर इस कुप्रथा को जड़ से समाप्त करने की जरूरत है।

Author Published on: August 2, 2019 1:54 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

तलाक-ए-बिद्दत यानी तीन तलाक की कुप्रथा को वर्षों पहले खत्म कर देना चाहिए था। विश्व के अनेक मुसलिम देश तीन तलाक पर पाबंदी लगा चुके हैं, यहां तक कि पाकिस्तान भी। लेकिन हमारे देश के कुछ राजनीतिक दलों ने अपने सियासी स्वार्थों और वोट बैंक के चलते इसे रोकने के लिए कानून नहीं बनाया। नतीजतन, लंबे अरसे से चली आ रही यह कुप्रथा मजहब का हिस्सा जैसी बना दी गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार देकर और सरकार ने कानून बना कर ऐतिहासिक कार्य किया है। इसे देर आयद दुरुस्त आयद ही कहा जाएगा। इस कुप्रथा के कारण मुसलिम महिलाएं निकाह के बाद भी खुद को असुरक्षित महसूस करती रहीं। मामूली बातों पर शौहर के तीन बार तलाक कह देने भर से उनका और उनके बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाता था।

यह बहुत अचरज की बात है कि इस कुप्रथा को समाप्त करने में भी कई विपक्षी दल सरकार के साथ खड़े नजर नहीं आए और सरकार का विरोध करते रहे जबकि तीन तलाक कानून को राजनीतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि समाज सुधार की दृष्टि से देखा जाना चाहिए था। साथ ही, 1939 के मुसलिम विवाह विच्छेद कानून के समय की तरह ही पर्सनल लॉ बोर्ड को आगे आकर तीन तलाक को खत्म करने के लिए खुद पहल करनी चाहिए थी, पर बोर्ड ने आश्चर्यजनक तथ्य देते हुए तीन तलाक को खुदा का कानून (मिल्ली तशख्खुस) करार दिया और इसमें संशोधन को सिरे से नकार दिया।

तीन तलाक वास्तव में संविधान के अनुच्छेद 14 और 25 का उल्लंघन है। कुरान के सिद्धांतों और हनीफी कानून के तहत भी इसे पाप माना गया है। कहा जाता है कि तीन तलाक इस्लाम-पूर्व अरब समाज में व्याप्त कुरीति थी, जिसे कुरान में ‘तलाक केवल दो बार है’ कह कर खत्म किया गया था पर इस कुरीति ने बाद में पुनर्जन्म ले लिया और समाज को जकड़ने का कार्य किया।

बहरहाल, तीन तलाक के खिलाफ कानून तो और सरकार ने बना दिया है, पर समाज में शिक्षा को बढ़ावा देकर, जागरूक करने और मुसलिम युवाओं को आगे आकर इस कुप्रथा को जड़ से समाप्त करने की जरूरत है। पाकिस्तान में तीन तलाक पर प्रतिबंध लगने के बावजूद आज भी वहां इस कुप्रथा से निकाह तोड़े जा रहे हैं और कानून सिर्फ कोर्ट-कचहरी परिसर तक सिमट कर रह गया है।
’विकास बिश्नोई, हिसार, हरियाणा

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