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चौपाल: धन प्रतिनिधि

कहावत है कि बिना आग के धुआं नहीं होता है। यदि इसमें थोड़ी भी सच्चाई है तो यह हमारे देश के लिए अत्यंत घातक है। जो दल पैसों के बदले टिकट देने की सोच रखते हैं, क्या उनके हाथों में देश सुरक्षित रह सकेगा?

lok sabha election expenditure2019 के आम चुनावों में 90 हजार करोड़ रुपए तक कुल खर्च का अनुमान है। (illustration by manali ghosh)

चुनाव में पैसे लेकर टिकट देने का आरोप कई राजनीतिक दलों पर लगता रहा है। हाल ही में एक चुनाव सभा में एक कांग्रेसी नेता ने बसपा पर करोड़ों रुपए लेकर टिकट बेचने का आरोप लगाया। ये नेताजी पहले बसपा में ही थे। सवाल है कि इन आरोपों में कितनी सच्चाई है! क्या सच में राजनीतिक दल करोड़ों रुपयों के बदले में टिकट का सौदा करते हैं? कहावत है कि बिना आग के धुआं नहीं होता है। यदि इसमें थोड़ी भी सच्चाई है तो यह हमारे देश के लिए अत्यंत घातक है। जो दल पैसों के बदले टिकट देने की सोच रखते हैं, क्या उनके हाथों में देश सुरक्षित रह सकेगा? दूसरी बात यह कि जो व्यक्ति करोड़ों रुपए देकर चुनाव लड़ेगा, चुनाव जीतने के बाद उसका सारा ध्यान तो किसी भी तरीके से अपनी तिजोरी भरने में ही लगा रहेगा। ऐसे में वह देश या समाज का कुछ भी भला नहीं कर सकता। हमें ऐसे नेताओं की पहचान कर उन्हें रोकना चाहिए।
’बृजेश श्रीवास्तव, गाजियाबाद

चुनावी वायदा
कांग्रेस अध्यक्ष ने घोषणा की है कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो वे न्यूनतम आय गारंटी योजना के तहत पच्चीस करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने के लिए उन्हें हर वर्ष बहत्तर हजार रुपए देंगे। पहली बात तो यह कि आजादी के सत्तर साल बाद भी देश की एक चौथाई आबादी गरीबी की रेखा से नीचे कैसे रही जबकि कांग्रेस स्वयं पचास साल तक सत्ता पर काबिज रही है? दूसरी बात, कांग्रेस अध्यक्ष की दादीजी ने 1971 में गरीबी हटाओ का नारा दिया था फिर भी गरीबी क्यों नहीं हटी? तीसरी और अहम बात यह कि जब कांग्रेस अध्यक्ष के पिताजी ने सत्ता संभालते ही देश को इक्कीसवीं शताब्दी में ले जाने और सुपर कंप्यूटर दिलाने की बात की थी, तब भी क्या उन्हें भारत की गरीबी दिखाई नहीं दी?

2004 से 2014 तक कांग्रेस केंद्र में लगातार दस वर्ष तक सत्ता में थी, तब यह गरीबी हटाने की बात क्यों नहीं सूझी? अब अचानक क्या कारण हुआ कि कांग्रेस अध्यक्ष को गरीबी हटाने की बात याद आ गई? मुद्दों की कंगाली से जूझ रही कांग्रेस पार्टी शायद जनता के टैक्स के पैसों को गरीबों में बांट कर सत्ता हथियाना चाहती है। लेकिन बहत्तर हजार रुपए वार्षिक देने से गरीबों की गरीबी मिट जाएगी ऐसा होना मुमकिन भी नहीं लगता क्योंकि छह हजार मासिक में गरीब खाएगा क्या और गरीबी दूर करने के उपाय करेगा क्या? देशवासियों की गरीबी दूर करने के लिए उनके लिए शिक्षा और रोजगारोन्मुखी कार्यक्रम पेश करने होंगे न कि मुफ्त में रुपए बांटने से यह होगा। अंत में बात यह कि कांग्रेस अध्यक्ष कहीं किसी की कोई गरीबी दूर करने वाले नहीं। यह महज वोट हासिल करने के लिए चुनावी चाल है।
’सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी, दिल्ली

साख का सवाल
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कंधों पर इस देश को संविधान सम्मत चलाने का दायित्व है। इन तीनों में से एक पर भी अगर आरोप लगते हैं तो समझिये इस देश मेंलोकतंत्र कलंकित होता है। सर्वोच्च अदालत में भी कुछ ऐसा ही खेल इस समय चल रहा है। न्यायपालिका के शीर्ष पद पर आसीन व्यक्ति पर एक महिला ने यौन शोषण का आरोप लगाया है। निश्चित रूप में किसी भी महिला का सम्मान सबसे अहम होता है। लिहाजा इस मामले में जांच और कार्रवाई जरूर होनी चाहिए। मगर महिला ने आरोप लगाने का जो तरीका चुना उससे कई सवाल खड़े होते हैं। मसलन, उसने आरोपों वाला शपथ पत्र सभी न्यायाधीशों के साथ-साथ मीडिया को भी जारी किया। इसका मतलब यह हुआ कि इस विषय को सनसनीखेज बनाने की दिलचस्पी ज्यादा दिखाई दे रही है। इससे पूर्व भी दो मुख्य न्यायाधीशें, न्यायमूर्ति जेएस खेहर और दीपक मिश्रा पर भी उंगली उठाने की कोशिश की गई थी। दीपक मिश्रा के मामले में तो महाभियोग चलाने की भी मांग उठी थी। यह साख का संकट है। यहां एक व्यक्तिपर हमला करके इस संस्था की साख को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। उम्मीद है कि दो अलग-अलग जांच टीमों के गठन से मामले की तह तक पहुंचने में काबयाबी मिलेगी।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

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