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चौपाल: मौन मतदाता

ये मौन मतदाता ही इस चुनाव की असली गुत्थी हैं। जब लोगों से यह पूछा जाता है कि किसे वोट देंगे तो हर दूसरे वोटर का जवाब होता है, अभी तय नहीं किया है और जब पूछा जाता है कि हवा किसकी है तो जवाब होता है, इस बार वैसी तो कोई हवा दिख नहीं रही!

Author Published on: April 30, 2019 2:06 AM
पांचवें चरण का मतदान हो गया है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

इस चुनाव में और पिछली बार के चुनाव में भी यह सवाल आम रहा है कि विपक्ष का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है? जवाब किसी के पास नहीं है। इसलिए नहीं कि यहां अमेरिका की तरह दो पार्टियों का मुकाबला नहीं है। यहां दो गठबंधनों का भी मुकाबला राष्ट्रीय स्तर पर नहीं है; बस महाराष्ट्र, बिहार, तमिलनाडु में है, बाकी राज्यों में कोई संयुक्त विपक्षी गठबंधन है ही नहीं। कर्नाटक में कांग्रेस-जनता दल (एस) गठबंधन है, जिसके सामने भाजपा अकेली है तो उत्तर प्रदेश में भाजपा-अपना दल-निषाद का राजग है, सपा-बसपा-रालोद का महागठबंधन है मगर कांग्रेस अकेली है। वैसे भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में चुनाव से पहले प्रधानमंत्री उम्मीदवार कोई जरूरी होता भी नहीं है, क्योंकि चुनाव सांसदों का होता है। जो पार्टी या गठबंधन जीतता है, उसके चुने हुए जनप्रतिनिधि अपना नेता चुनते हैं। तो यह वैकल्पिक होता है कि चाहे तो कोई चेहरा आगे करके लड़े और चाहे तो न लड़े।

कांग्रेस ने औपचारिक रूप से किसी चेहरे को आगे नहीं किया है, न यूपीए ने किया है, न किसी और विपक्षी पार्टी ने, लेकिन भाजपा और उसके तीन दर्जन घटकों ने तीन-चार साल पहले ही मौजूदा प्रधानमंत्री को 2019 के लिए अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था। इस बार 50 दिन के चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री का कम से कम 150 चुनावी सभाएं करने का कार्यक्रम है यानी औसतन तीन रैलियां या रोड शो रोजाना। 23 अप्रैल तक प्रधानमंत्री कुल 65 हजार 302 किलोमीटर की यात्रा कर चुके हैं। यहां एक दिलचस्प आंकड़ा गौरतलब है कि प्रधानमंत्री से भी ज्यादा दूरी राहुल गांधी उतने ही दिनों में नाप चुके हैं, 84 हजार 990 किलोमीटर यानी करीब 20 हजार किलोमीटर ज्यादा। इसकी न मीडिया में चर्चा है, न खुद कांग्रेस भाजपा की तरह इवेंट बना कर पेश कर पा रही है।
हमें खुद नहीं पता कि जब उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस कुल मिलाकर दर्जन भर सीटें लाती भी नहीं दिख रही तो राहुल गांधी आखिर कहां चुनाव प्रचार कर रहे हैं, किन इलाकों को नाप रहे हैं? क्या वे उन साइलेंट वोटर्स यानी मौन मतदाताओं को साधने में लगे हैं, जो अपने पत्ते नहीं खोल रहे? भाजपा समर्थक हमेशा से मुखर होते हैं, जहां जीतने की स्थिति में होते हैं, वहां विरोधियों की जमानत जब्त कराने की बात करते हैं और जहां हारने की स्थिति में होते हैं वहां भी जीत का माहौल बनाए रखते हैं, यह हम सब जानते हैं। दूसरी ओर, उसे वोट न देने वाले मौन साधे रहते हैं, क्योंकि उनके सामने राष्ट्रीय स्तर पर कोई विकल्प है नहीं और आक्रामक प्रतिक्रिया से डरे-सहमे भी रहते हैं और तादाद इनकी भी कम नहीं है।

ये मौन मतदाता ही इस चुनाव की असली गुत्थी हैं। जब लोगों से यह पूछा जाता है कि किसे वोट देंगे तो हर दूसरे वोटर का जवाब होता है, अभी तय नहीं किया है और जब पूछा जाता है कि हवा किसकी है तो जवाब होता है, इस बार वैसी तो कोई हवा दिख नहीं रही! यही सवाल अगर भाजपा समर्थक से पूछा जाए तो जवाब 300 तो छोड़िए 400 सीट के पार भी पहुंच जाता है और हवा तो छोड़िए लहर और सुनामी चलने लगती है! अब पता नहीं जमीनी सच्चाई क्या है, क्योंकि मीडिया और सोशल मीडिया की बहस या जनसभाओं की भीड़ वोट में बदल भी सकती है और नहीं भी। लेकिन असली फर्क शहरी लोकसभा सीटों और ग्रामीण लोकसभा सीटों की जमीनी स्थिति से पता चलता है, जिसका आकलन घर या आॅफिस में बैठ कर कर पाना संभव नहीं होता।
’मो. ताबिश, जामिया, नई दिल्ली

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