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चौपाल: जात न पूछो

सभी सामाजिक संगठन मिल कर ऐसी घटनाओं व लोगों का प्रतिकार करें तभी समाज को एकजुट रखने के हमारे प्रयास सफल होंगे।

शादी की प्रतीकात्मक तस्वीर, (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

मध्यप्रदेश के आगर मालवा में एक दूल्हे को घोड़ी चढ़ने से रोका गया। क्या आज भी किसी की जाति देख कर तय होगा कि दूल्हा घोड़ी पर बैठेगा या नहीं? यह संविधान का उल्लंघन है और पुलिस को कठोर धाराओं से ऐसे असामाजिक तत्त्वों के खिलाफ मामला दर्ज कर उन्हें जेल भेजना चाहिए। जातिवाद किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। सभी सामाजिक संगठन मिल कर ऐसी घटनाओं व लोगों का प्रतिकार करें तभी समाज को एकजुट रखने के हमारे प्रयास सफल होंगे।
’मंगलेश सोनी, मनावर, धार, मध्यप्रदेश

महंगा प्याज
प्याज की बढ़ती महंगाई से आमजन परेशान हैं। प्याज की कीमत सौ रुपए पार कर जाना गंभीर चिंता का विषय है और उस पर सरकार से सवाल करना भी स्वाभाविक हो जाता है। लेकिन विडंबना है कि ऐसे गंभीर मुद्दे पर भी देश की वित्तमंत्री ने मजाकिया लहजे में कहा कि प्याज की बढ़ती कीमतों से व्यक्तिगत तौर से उन पर कोई खास असर नहीं पड़ा है, क्योंकि उनका परिवार प्याज-लहसुन जैसी चीजों को खास पसंद नहीं करता है। वित्तमंत्री ने कहा, ‘मैं बहुत ज्यादा प्याज-लहसुन नहीं खाती…इसलिए चिंता न करें। मैं ऐसे परिवार से आती हूं, जिसे प्याज की कोई खास परवाह नहीं है।’
उनका यह जवाब महंगाई की मारी गरीब जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। यह देश की गरीब जनता का उपहास उड़ाता हुआ लग रहा है। यदि वित्तमंत्री को इस महंगाई से कोई फर्क नहीं पड़ता तो इसका यह अर्थ कतई नहीं कि आमजन को भी फर्क नहीं पड़ता।
’मंजर आलम, रामपुर डेहरू, मधेपुरा, बिहार

पोषण या जहर
इन दिनों मध्याह्न भोजन योजना अपनी उपलब्धियों को लेकर नहीं बल्कि दूषित खाना परोसने, भ्रष्टाचार व सामाजिक भेदभाव की वजह से भी चर्चा में रहती है। कभी खाने में छिपकली तो कभी चूहा पाया जाता है। कभी बासी खाना परोसा जाता है तो कभी सड़ा हुआ और कई बार दलित रसोइया होने पर विवाद होता है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मुस्तफाबाद पचेंडा गांव में जनता इंटर कॉलेज के बच्चों को मध्याह्न भोजन परोसा गया जिसमें मरा हुआ चूहा मिला। यह खाना खाकर बच्चे बीमार हो गए। उत्तर प्रदेश में करीब 1,68,768 विद्यालय ऐसे हैं जहां बच्चों को मध्याह्न भोजन दिया जाता है जिसकी पौष्टिकता सर्वविदित है। आए दिन इसमें अनियमितताओं की खबरें राज्य के हर कोने से आती हैं।

यह स्थिति तब है जब सरकार हजारों करोड़ रुपए इस योजना पर न सिर्फ खर्च कर रही है बल्कि निगरानी और क्रियान्वयन के लिए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के नेतृत्व में एक प्राधिकरण है। इसके सोशल आॅडिटिंग की व्यवस्था भी लागू है। फिर भी यह योजना बिल्कुल भगवान भरोसे है। सरकारी स्कूलों में केवल गरीब परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं शायद इसलिए भी इसे कोई ज्यादा गंभीरता लेता नहीं है। बस नीचे से ऊपर तक कमीशन लेने की होड़ रहती है। इस योजना में भ्रष्टाचार करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर निश्चित ही सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि अधिकारी और कर्मचारी मध्याह्न भोजन को मुफ्त में दिया गया खाना न समझ कर इसे बच्चों का हक समझें।
’सुनील कुमार सिंह, मेरठ, उत्तर प्रदेश

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