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चौपाल: चिंता की बात

देश न तो छपाक से चलेगा और न जामिया-जेएनयू पर राजनीति से बढ़ेगा। देश का विकास तभी होगा, जब अर्थव्यवस्था का विकास होगा। जिन युवाओं के दम पर दुनिया के सबसे युवा देश यानी भारत अपने विकास की उम्मीद लगाए बैठा है।

Author Published on: January 16, 2020 2:48 AM
देश का विकास तभी होगा, जब अर्थव्यवस्था का विकास होगा।

देश के आर्थिक हालात दिनों-दिन चिंताजनक होते जा रहे हैं। जीडीपी पांच फीसद तक लुढ़क गई, बेरोजगारी दर पैंतालीस साल के उच्चतम स्तर पर है, खुदरा महंगाई दर साढ़े पांच साल के उच्चतम स्तर पार कर 7.35 फीसद पर पहुंच गई है, क्रय शक्ति दशक के निम्नतम स्तर पर है, रिजर्व बैंक से ली गई राशि से अर्थव्यवस्ता में कोई सुधार नजर नहीं आ रहा, नए स्टार्टअप खुलने से ज्यादा पहले से खुले स्टार्टअप बंद होते जा रहे हैं और अब आने वाले वित्त वर्ष में नौकरियों में और छंटनी के साफ संकेत आ रहे हैं। ये स्थिति कतई अच्छी नहीं है, न ही इस स्थिति को व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के जरिए प्रसारित इन थोथी दलीलों- मसलन, रोजगार इसलिए नहीं है कि लोग सरकारी नौकरी ही चाहते हैं और क्रय शक्ति नहीं है तो लोग तानाजी-छपाक कैसे देख रहे हैं और कांग्रेस के समय में तो जैसे रामराज चल रहा था, वगैरह-वगैरह, से लंबे समय तक ढक सकते हैं। पिछले वित्त वर्ष (2018-19) में जब जब देश की अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही थी, तब राजनीतिक पार्टियों की अर्थव्यवस्था सुधर रही थी। भाजपा की कुल आय 2017-18 में 1027 करोड़ थी, जो एक साल में बढ़ कर 2018-19 में 2410 करोड़ हो गई। दूसरी ओर कांग्रेस की आय 2017-18 में 199 करोड़ थी, जो 2018-19 में बढ़ कर 918 करोड़ रुपए हो गई। यहां यह जानना भी जरूरी है कि ये आंकड़े इन पार्टियों के दिए हुए हैं, सार्वजनिक हैं।

देश न तो छपाक से चलेगा और न जामिया-जेएनयू पर राजनीति से बढ़ेगा। देश का विकास तभी होगा, जब अर्थव्यवस्था का विकास होगा। जिन युवाओं के दम पर दुनिया के सबसे युवा देश यानी भारत अपने विकास की उम्मीद लगाए बैठा है, उन युवाओं को शिक्षा और रोजगार कैसे मिले, विमर्श इस पर केंद्रित होना चाहिए। जब जनता इसका दबाव बनाएगी तो सत्ता और विपक्ष को इस पर काम करने को मजबूर होना पड़ेगा, वरना ये राजनीतिक ताकतें सबको फिजूल के मुद्दों में उलझाए रख कर अपनी अर्थव्यवस्था संवारती रहेंगी और देश आर्थिक बदहाली के कीचड़ में छपाक-छपाक करता रहेगा।
’मो. ताबिश, जामिया विवि, नई दिल्ली

कैसे होगा पुलिस सुधार
संयुक्त राष्ट्र के मानदंड को अगर माने तो हमें एक लाख की आबादी पर दो सौ बाईस पुलिसकर्मी चाहिए। मगर हम इस वक्त केवल एक सौ सैंतीस पुलिसकर्मियों से काम चला रहे हैं। मतलब आज भी देश में साढ़े पांच लाख पुलिसकर्मियों की कमी है। अकेले उत्तर प्रदेश में एक लाख उनतीस हजार पद खाली पड़े हैं। ऐसे में पुलिस आयुक्त प्रणाली की शुरुआत से क्या फर्क पड़ेगा? हालांकि पुलिस सुधार के लिए यह भी एक कदम जरूर है। मगर सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में इस पर जो आदेश दिया था, वह गृह मंत्रालय में धूल फांक रहा है। उत्तर प्रदेश में कुछ हफ्ते पहले पच्चीस हजार होम गार्ड जवानों को घर बैठा दिया गया था। केवल पद का नाम बदल देने से कुछ नहीं होगा। बिना छुट्टी के अठारह घंटे काम कराए जाते रहेंगे। ऐसे में हम पेशेवर पुलिसिंग खोजेंगे तो कहां से मिलेगा?
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी,जमशेदपुर

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