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चौपाल : सुरक्षा का तकाजा

इसमें कोई संदेह नहीं कि सीआइएसएफ और वायुसेना दोनों ही ऐसे हमलों से निपटने में सक्षम हैं लेकिन जमीनी हमले से बचाव के लिए हमारे पास कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। इसमें भी आत्मघाती हमलों के सामने हर बार बेबसी ही झलकती है।

Author Published on: March 13, 2019 3:49 AM
वायुसेना द्वारा पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को ध्वस्त करने की खबर के बाद जश्न मनाते भारतीय। (Photo: REUTERS)

बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी ट्रेनिंग कैंप पर हवाई हमले के बाद हर भारतीय जोश में है। यह जोश उस वक्त और बढ़ गया जब भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के घुसपैठिये एफ-16 लड़ाकू हवाई जहाज को मार गिराया। जांबाज पायलट अभिनंदन एफ-16 को मार गिराने के दौरान गलती से पाकिस्तान सीमा में पहुंचे तो भी पाकिस्तान को उन्हें लौटाने पर मजबूर होना पड़ा। इससे इन दिनों हर भारतीय का सीना चौड़ा है और उसे लगता है कि हमने पाकिस्तान को सही सबक सिखाया है; अब शायद ही पाकिस्तान की हिम्मत हो हमसे टकराने की! लेकिन खुफिया जानकारियां कहती हैं कि आतंकी संगठनों को सामने रख कर पाकिस्तान फिर से हमला करा सकता है। इस बार हमला ड्रोन के जरिए संभावित है। इसमें हवाई अड््डों को निशाना बनाने की आशंका ज्यादा है। इसके अलावा आतंकी आत्मघाती हमलों को भी अंजाम दे सकते हैं। ऐसे में जमीनी और आसमानी दोनों तरह के खतरों से सतर्क रहने की जरूरत है।

इस खुफिया जानकारी के बाद ही ड्रोन हमलों की संभावना के मद्देनजर देश के सभी हवाई अड््डों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। यह भी तय हो गया है कि देश के 61 हवाई अड््डों पर सुरक्षा के लिए तैनात सीआइएसफ, वायुसेना और एयर ट्रैफिक कंट्रोल मिल कर काम करेंगे। यदि ड्रोन 600 मीटर तक की ऊंचाई पर है तो सीआइएसएफ उसे मार गिराने में सक्षम है लेकिन यदि ऊंचाई इससे ज्यादा रहती है तो उसके लिए वायुसेना कार्रवाई करेगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि सीआइएसएफ और वायुसेना दोनों ही ऐसे हमलों से निपटने में सक्षम हैं लेकिन जमीनी हमले से बचाव के लिए हमारे पास कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। इसमें भी आत्मघाती हमलों के सामने हर बार बेबसी ही झलकती है। खुफिया एजेंसियों की सूचनाओं के बाद बहुत बार हमारे स्थानीय खुफिया तंत्र की विफलता या गैर जिम्मेदाराना रवैया हमलों की वजह बनता है। यदि पर्याप्त चौकसी के साथ ही एक स्थानीय खुफिया तंत्र और पुलिस विभाग मुस्तैदी के साथ काम करें तो आतंकियों के मंसूबों को समय से पहले ही ध्वस्त किया जा सकता है।

इतिहास गवाह है कि ज्यादातर आतंकी हमलों में स्लीपर सेल और स्थानीय मददगारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इन जांच बिंदुओं पर यदि गंभीरता के साथ काम किया जाए तो आतंकियों के बहुत सारे नापाक प्रयास विफल हो सकते हैं। देखा जाए तो सैन्य प्रतिष्ठानों, महत्त्वपूर्ण सरकारी भवनों और संस्थाओं आदि की सुरक्षा को लेकर हमारे पास एक तंत्र है लेकिन भीड़भाड़ वाली जगहों, मॉल-बाजारों, यहां तक कि रेलगाड़ियों आदि में आम लोगों की सुरक्षा के लिए हमारे पास कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। हम सभी को इस पर भी गौर करने की जरूरत है तभी जाकर हम आतंकवाद के जमीनी और आसमानी दोनों प्रकार के खतरों से सुरक्षित रह सकते हैं।
’अमन सिंह, प्रेमनगर, बरेली, उत्तर प्रदेश

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