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चौपाल: सशक्त लोकतंत्र

पुराने, घिसे-पिटे और निष्प्रभावी तौर-तरीकों के कारण ही भारतीय लोकतंत्र श्रेष्ठ रूप नहीं ले पा रहा है। निस्संदेह भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन जरूरत तो इसकी है कि वह श्रेष्ठ और सशक्त लोकतंत्र बने।

Author June 4, 2019 2:14 AM
संसद, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

प्रधानमंत्री बार-बार कहते रहे हैं कि सरकार तो बहुमत से बनती है, लेकिन देश सबकी सहमति से चलता है। उनके इस कथन पर विपक्षी दलों की राय जो भी हो, इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि आज के दौर में जब देश बदल रहा है और उसकी अपेक्षाएं बढ़ रही हैं तब राजनीति के तौर-तरीकों में बुनियादी बदलाव की सख्त जरूरत है। सबसे अधिक जरूरत संसदीय कामकाज में बदलाव लाने की है। इस बदलाव से राजनीति का भी भला होगा। पुराने, घिसे-पिटे और निष्प्रभावी तौर-तरीकों के कारण ही भारतीय लोकतंत्र श्रेष्ठ रूप नहीं ले पा रहा है। निस्संदेह भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन जरूरत तो इसकी है कि वह श्रेष्ठ और सशक्त लोकतंत्र बने।
’हेमंत कुमार, गोराडीह, भागलपुर, बिहार

अभद्र बोल
हमारी आम बोलचाल की भाषा में कुछ ऐसे बेहूदा शब्द शामिल होते जा रहे हैं जिन्हें कभी जबान पर लाने पर व्यक्ति को बुरा समझा जाता था। अनेक अभद्र शब्द फिल्मों, सोशल मीडिया और आम व्यवहार में इस्तेमाल हो रहे हैं। और भी हैरानी की बात है कि ये शब्द लड़कियों और महिलाओं द्वारा भी धड़ल्ले से बोले जा रहे हैं। कई फिल्मों में जब ये शब्द बोले जाते हैं तब पूरे सिनेमा हॉल में हंसी के फव्वारे फूट पड़ते हैं, लेकिन उस समय अनेक सभ्य व्यक्ति अपने परिवार की उपस्थिति में शर्मिंदगी से नजरें झुका लेते हैं। कैसी संस्कृति होती जा रही है हमारी? हम अपनी मां-बहन-बेटियों के सामने ऐसी भाषा कैसे कह-सुन सकते हैं? फिल्म सेंसर बोर्ड इन शब्दों को कैसे मान्यता दे सकता है?

आज कुछ लोगों को अपनी बहन-बेटी को सेक्सी कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती बल्कि इसे गर्व से कहा जा रहा है, लेकिन जरा गंभीरता से सोचा जाए तो उन्हें इस शब्द से घिन्न होने लगे। इन अभद्र शब्दों की सूची बड़ी है और दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। कुछ समय बाद हो सकता है सार्वजनिक मंचों, पत्र-पत्रिकाओं, फिल्मों, सोशल मीडिया आदि पर खुलेआम ऐसे शब्द, मां-बहन की गलियां और अश्लील शब्द कहे जाने लगें। समाज का निर्माण हम स्वयं करते हैं और उसे अपनी अगली पीढ़ी को सौंप देते हैं। अब यह फैसला सभी अभिभावकों, शिक्षकों और बुद्धिजीवियों को करना है कि अपने बच्चों को इन भौंडे शब्दों से कैसे बचाए रखना है, बचाए रखना भी है या इन शब्दों पर चुप्पी साध लेनी है अथवा इन्हें प्रोत्साहन देना है!
’सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी, दिल्ली

गुस्से पर काबू
लोकसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं। नई केंद्र सरकार ने अपना कार्य भी आरंभ कर दिया है पर लगता है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री अभी भी ‘इलेक्शन मोड’ में चल रही हैं। ममता बनर्जी के सामने जब भी जय श्रीराम का नारा लगता है तो वे भड़क जाती हैं। इस तरह की घटनाओं की खबर पश्चिम बंगाल से लगातार आ रही है। ममता बनर्जी ने नारा लगाने वालों की खाल उधेड़ने की धमकी भी दी। कुछ लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया है। सवाल है कि क्या पश्चिम बंगाल में जय श्रीराम का नारा लगाना कानूनन अपराध है? ममता बनर्जी को संयम से काम लेते हुए अपने गुस्से पर काबू रखना चाहिए। इस तरह से तो वे अपना ही नुकसान कर रही हैं।
’बृजेश श्रीवास्तव, गाजियाबाद

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