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चौपाल: मुद्दे का चुनाव

पिछले पांच वर्षों का हिसाब-किताब देने और 2014 में किये वादों पर बात करने के बजाय उन्होंने पुलवामा और बालाकोट को चर्चा का विषय बना कर सभी विपक्षियों और जनता को अपने जाल में उलझा दिया।

Author Published on: May 10, 2019 2:20 AM
Loksabha Elections 2019, Narendra Modi, PM, BJP, Amit Shah, Congress, Rahul Gandhi, Election Commission, Model Code of Conduct, Relief, Clean Chit, Complaint, India News, National News, Hindi NewsLoksabha Elections 2019: पीएम मोदी और अमित शाह (फाइल फोटोः पीटीआई)

युवावस्था में किसी लेख में पढ़ा था कि अगर आप इंटरव्यू में सफल होना चाहते हैं तो इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों को भ्रमित कर उस क्षेत्र में खींच लाओ जिसमें आप दखल रखते हो। उस स्थिति में आपका चयन आसानी से हो सकता है यानी आप कुछ ऐसा कहें जिससे सदस्य आपसे वही सवाल पूछें जिनका आपके पास जवाब हो।

हालिया वक्त में देश की राजनीति में सफल होने के लिए भाजपा और विशेषकर इसके शीर्ष नेताओं ने यही तरीका अपनाया। पिछले पांच वर्षों का हिसाब-किताब देने और 2014 में किये वादों पर बात करने के बजाय उन्होंने पुलवामा और बालाकोट को चर्चा का विषय बना कर सभी विपक्षियों और जनता को अपने जाल में उलझा दिया। फिर बीच चुनाव में मसूद अजहर के वैश्विक आतंकवादी घोषित होने के बाद तो उनकी बाछें खिल गर्इं। कांग्रेस के शासन कल में गर्भित यह मुद्दा ऐसे समय में सफलता के पायदान पर पहुंचा जब देश में मतदान के तीन चरण अभी बाकी थे।

अगर भूले-भटके कुछ विरोधी बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और किसानों से जुड़े मुद्दे उठाते भी हैं तो उनकी आवाज को महाभारत में अश्वत्थामा के प्रसंग से जुड़े तरीके से दबा दिया जाता है। इसे सफल राजनीति मानें या एक आत्मघाती कदम, इस सवाल का जवाब तो तेईस मई को मिलेगा लेकिन यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि हमारे सभी विपक्षी दल सत्तारूढ़ पार्टी की इस रणनीति की कोई प्रभावी काट अभी तक नहीं खोज पाए हैं। आखिर, अपनी मनमर्जी से चुनावी मुद्दे तय करने को क्यों न राजनीतिक कौशल माना जाए? इतिहास इस बात का गवाह है कि विजय इंसान की सभी कमियों पर पर्दा डाल देती है।
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली

श्रमेव जयते
भविष्य के भारत की ऐसी तस्वीर होनी चाहिए जिसके नागरिक सरकारी बैसाखियों के सहारे चलने वाले लोगों का समुदाय न होकर ‘श्रमेव जयते’ के अकाट्य सत्य के प्रति आस्थावान हों। ऐसे नागरिक ही सबल और सक्षम देश का निर्माण कर सकते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि चाहे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम हों या सरकारी संस्थान अथवा निजी क्षेत्र, उनमें कार्यरत लोगों को उनके हक का पैसा समय पर प्राप्त हो। गांधीजी ने भी कहा था कि मजदूर को उसकी मजदूरी का भुगतान उसका पसीना सूखने के पूर्व ही कर दिया जाना चाहिए। व्यवस्था में उलझा कर ऐसे श्रमजीवियों के हक का पैसा देने में विलंब करने से मजदूरों का मनोबल गिरता है। सभी को संकल्प लेना चाहिए कि मजदूरों को उनके अधिकार और श्रम का पैसा समय पर प्राप्त हों।
’ललित महालकरी, इंदौर, मध्यप्रदेश

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