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चौपाल: भाषा की जगह व रोजगार का सवाल

कई भाषाओं जैसे भोजपुरी और राजस्थानी के लोग भी लगातार प्रयासरत हैं कि उनकी मातृभाषा को मान्यता मिले और उसमें भी रोजी रोजगार हो।

भारत में हिंदी की तरह अनेक भाषाए हैं जो हिंदी जैसी ही समृद्ध हैं।

कुछ दिन पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री के ‘एक देश-एक भाषा’ की वकालत करने से बेवजह का विवाद पैदा करने की कोशिश गई। गृहमंत्री ने कहा था कि हिंदी ही देश को एकता की डोर में बांधने और विश्व में भारत की पहचान बनाने का काम कर सकती है। उनके इस बयान पर दक्षिण के राज्यों से तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगीं। विपक्षी दलों कांग्रेस और भाकपा ने भी इस बयान की आलोचना की। भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषा का मुद्दा बेहद संवेदनशील रहा है। संविधान निर्माताओं को इसका एहसास था, इसलिए उन्होंने हिंदी को संघ की राजभाषा का दर्जा दिया लेकिन अंग्रेजी के उपयोग का भी प्रावधान रखा। अनुच्छेद 346 और 347 में कहा गया है कि राज्य के विधानमंडल द्वारा राज्य में प्रयोग की जाने वाली किसी भी एक या अधिक भाषाओं या हिंदी को राज्य में किसी भी या सभी राजकीय उद्देश्यों से उपयोग के लिए अपना सकता है।

भारत में हिंदी की तरह अनेक भाषाए हैं जो हिंदी जैसी ही समृद्ध हैं। संविधान की आठवीं अनुसूची में भी बाईस भाषाओं को मान्यता दी गई है। कई भाषाओं जैसे भोजपुरी और राजस्थानी के लोग भी लगातार प्रयासरत हैं कि उनकी मातृभाषा को मान्यता मिले और उसमें भी रोजी रोजगार हो। पिछले कुछ वर्षों में अंग्रेजी को लोगों ने बढ़-चढ़ कर अपनाया है क्योंकि यह रोजगार और नई तकनीक की भाषा है। रही बात हिंदी की, तो यह लगातार संपर्क भाषा के रूप में बढ़ रही है। कोई भी राज्य अपनी मातृभाषा कभी नहीं छोड़ेगा, इससे देश का विकास भी रुकने वाला नहीं है। एक भाषा की बात करने वाले देश की तमाम प्रमुख परीक्षाओं जैसे-यूपीएससी, जेईई, नीट सबमें अंग्रेजी को ज्यादा तरजीह देते हैं। क्या यह सच में हिंदी भाषा की परवाह है? बेहतर होगा कि सियासी दल भाषा जैसे संवेदनशील मामलों से दूर रहें और इस मामले में लोगों को फैसला करने दें।

’प्रिंस अभिषेक, छपरा, बिहार

रोजगार का सवाल

देश में बेरोजगारी इन दिनों 45 वर्षों के चरम पर है। इसकी तुलना में विभिन्न विभागों में खाली पड़े पदों की पड़ताल के लिए एक विभाग का ही उदाहरण लिया जाए तो सारे देश की स्थिति का अंदाजा लग जाएगा। अकेली उच्च शिक्षा की बात करें तो 2017-18 के ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन की रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में 40 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। इनमें प्राध्यापकों के 2476 पद स्वीकृत हैं जिनमें से 1301 खाली पड़े हैं। यानी करीब 54 प्रतिशत प्राध्यापकों की कमी है। दिल्ली विश्वविद्यालय में 59 और जेएनयू में शिक्षकों के 50 फीसद पद रिक्त हैं। यहां 199 प्राध्यापकों का काम 100 शिक्षकों से चलाया जा रहा है। अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में 200 के बजाय 137, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में 253 के बजाय 171 प्राध्यापकों से ही काम चलाया जा रहा है।

मार्च 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक 23 आईआईटी में 2806 पद खाली पड़े हैं। सबसे ज्यादा 552 पद आईआईटी खडगपुर में खाली हैं। देश के आईआईटी में शिक्षकों की कमी पर सिलसिलेवार नजर डालें तो आईआईटी गोवा में 62, आईआईटी धारवाड में 47, आईआईटी खडगपुर में 46,आईआईटी कानपुर में 37, आईआईटी दिल्ली में 29 तथा आईआईटी मुंबई में 27 प्रतिशत शिक्षकों की कमी है। अगर सरकार देश के विभिन्न विभागों में रिक्त पड़े पदों को भरने का अभियान चलाए तो न सिर्फ बेरोजगारों की संख्या में आएगी बल्कि यह भी साबित हो जाएगा कि कमी युवाओं के कौशल में नहीं बल्कि उन्हें उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार उपलब्ध कराने के प्रयासों में है।
’देवेंद्र जोशी, उज्जैन

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