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चौपाल: कौशल और रोजगार

युवाओं की संख्या को देखते हुए हर साल 81 लाख नई नौकरियां और नए रोजगार अवसर पैदा करने की जरूरत है। इतने रोजगार सृजन के लिए शिक्षण-प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार और सार्वजनिक व निजी निवेश में भारी वृद्धि करनी होगी।

Author June 15, 2019 2:10 AM
रोजगार के मामले में चाहे किसी भी दल की सरकार हो, विपक्ष के निशाने पर रही है।

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2030 तक दुनिया के 19 विकसित और विकासशील देशों में साढ़े आठ करोड़ से ज्यादा कुशल श्रमशक्ति की कमी होगी। जबकि अकेले भारत के पास 2030 तक जरूरत से ज्यादा कुशल कामगार होंगे। भारत के लिए यह आर्थिक कमाई का प्रभावी साधन सिद्ध हो सकता है। उच्च कौशल प्रशिक्षित भारत की नई पीढ़ी को देश और दुनिया में अपार मौके मिलने की संभावना रहेगी। निश्चित रूप से उच्च शिक्षा और कौशल विकास पर उपयुक्त ध्यान देकर रोजगार की चुनौतियों के बीच रोजगार की नई संभावनाओं को साकार किया जा सकेगा। युवाओं की संख्या को देखते हुए हर साल 81 लाख नई नौकरियां और नए रोजगार अवसर पैदा करने की जरूरत है। इतने रोजगार सृजन के लिए शिक्षण-प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार और सार्वजनिक व निजी निवेश में भारी वृद्धि करनी होगी। विनिर्माण क्षेत्र को गतिशील करना होगा, निर्यात बढ़ाने होंगे और श्रम कौशल बढ़ाना होगा।
’अजीत कुमार गौतम, गोरखपुर

चौंकाने वाली तस्वीर
हाल में जारी एक सरकारी रपट में भारत में श्रमिकों की स्थिति के बारे में एक कठोर तस्वीर उभर कर आई है, जिसमें उनके न्यूनतम वेतन के लिए स्वीकृत मानदंडों से आधे से भी कम आय दर्ज की गई है। चौंकाने वाला तथ्य तो यह है कि इकहत्तर प्रतिशत श्रमिकों के पास कोई भी लिखित नौकरी अनुबंध नहीं है, चौवन प्रतिशत को छुट्टियों के पैसे का भुगतान नहीं मिलता है और ग्रामीण क्षेत्रों में सत्तावन प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में लगभग अस्सी प्रतिशत श्रमिक आठ घंटे के कार्य दिवस (48 घंटे प्रति सप्ताह) से बहुत अधिक काम करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बावन प्रतिशत से अधिक श्रमिक वास्तव में स्व-रोजगार से जुड़े हैं। यानी वे बड़े पैमाने पर खेती या छोटी दुकानें चला रहे हैं या फिर ऐसे उपक्रम जो उनके खुद के श्रम पर आधारित हैं, या विभिन्न प्रकार के सेवा प्रदाताओं के रूप में काम कर रहे हैं। लगभग एक चौथाई कामकाजी लोग दैनिक आधार पर काम पाते हैं और रोजाना मजदूरी कमाते हैं, जबकि लगभग एक चौथाई नियमित वेतन या वेतन-कमाने वाले कर्मचारी हैं। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) नामक रिपोर्ट, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) द्वारा किए गए लगभग एक लाख घरों (4.33 लाख व्यक्तियों) के सर्वेक्षण पर आधारित है।
’प्रियंबदा, गोरखपुर

शिक्षकों की कमी
बिहार के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की घोर कमी है, जिससे बच्चों का पठन-पाठन सुचारू ढंग से नहीं हो पाता है। दूसरी ओर, बेरोजगारी से जूझ रहे टीईटी, एसटीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थी अपनी शीघ्र बहाली को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। बिहार सरकार उनकी मांगों को नजरअंदाज करते हुए तरह-तरह के बहाने बना रही है। कभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के मुद्दे को बहाली की राह में अड़चन बताया, तो कभी आम चुनाव के कारण आचार संहिता की दुहाई दी गई। अब जबकि दोनों मामले साफ हो गए हैं तो फिर टाल मटोल क्यों? गत दिनों धरना-प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारी अभ्यर्थियों पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया गया, महिलाओं तक को नहीं बख्शा गया। बिहार सरकार को यथाशीघ्र शिक्षकों की बहाली करनी चाहिए। एक ओर शिक्षित बेरोजगारों में निराशा बढ़ रही है, वहीं सरकारी स्कूलों में अधिकांशत: आर्थिक रूप से पिछड़े समाज के बच्चे ही तालीम पाते हैं।
’मंजर आलम, रामपुर डेहरू, मधेपुरा

 

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